Wednesday, 13 April 2016

पंछी उडने को है ....


         मेरे बच्चे  ने अभी सोलह सावन ही पुरे किये है और सत्रवे मे बैठते ही उसने घर से दूर रह कर पढने की इच्छा मुझसे व्यक्त की तो मेरे मन मे उमंग की लहरे छा गई, किसी किसी को तो जबर्दस्ती बाहर भेजना पडता है जबकि मेरा बच्चा खुद ही मुझे बोल रहा था, मुझे गर्व है मेरे बच्चो पर दोनो ही बहुत ही समझदार है और निर्णय लेने मे भी पुर्ण समर्थ है, बच्चा तो हर काम सीखने मे बहुत ही तेज है अपनी छोटी बहिन से भी कुछ सीखना हो तो हिचकता नही है जब मै ने उसे बताया कि” –बेटा जब बाहर जायेगा तो खाना बनाना, बाईक चलाना, कपडे धोना अपना काम खुद करना सब आना चाहिये वहाँ पर तेरे साथ मे मम्मी पापा नही होंगे सब निर्णय खुद ही लेने होंगे और परिस्थितिया भी हमेशा अनुकूल रहे, ऐसा नही होता है,  बेटा ! खुस रहने के दो ही उपाय है, आवश्यकताये कम रखे और परिस्थितियो से ताल मेल बैठाये यदि तुम यह सब कर सकते हो तो फिर तुम बाहर रह कर पढने मे सक्षम हो ” 

         मेरे इतना कहने के बाद सब काम सीखने मे उसकी दिलचस्पी देख कर मुझे यकीन हो चला था कि अब पंछी उडने की तैयारी मे है और जब पंछी सच मे दिल से उडने की तैयारी मे हो तो उसके उडने की तैयारी पुरी खुसी और उमंग से करनी चाहिये,

         लेकिन माँ तो माँ ही होती है बेटा कितना ही बडा हो जाये वह उसे हमेशा बच्चा ही समझती है उसके मन मे  भय सा छा गया,वह सोचने लगी कि कैसे अकेला रह पायेगा तो बच्चे ने एक महिना छात्रावास मे बिताया और यह विस्वास दिलाया कि जब कोई कुछ करने की ठान लेता है तो कर ही गुजरता है मुझे मेरे परम पुज्य पिता जी कहते थे – बेटा जो जैसा सोचता है और करता है वह वैसा ही बन जाता है यही बात मै मेरे बच्चे से भी कहना चाहता हुँ लेकिन मुझे लगता है आजकल के बच्चे हमारे वक्त के बच्चो से एड्वांस तो है ही, लेकिन फिर भी माता- पिता का कर्तव्य होता है कि कुछ बाते तो बच्चो को सीखानी ही चाहिये

        प्रसिद्ध साईंटिस्ट अलबर्ट आईंसटीन लिखते है – “विज्ञान  अध्यात्म के बिना अंधा है और अध्यात्म विज्ञान के बिना  लंगडा है” मै जब आज से करीब चौबीस वर्ष पहले कोचिंग करने जयपुर गया था तो मुझे मेरे पिताजी ने गायत्री चालिसा देते हुये कहा – “बेटा यह माँ गायत्री का चालिसा है इसे रोजाना एक बार तो अवश्य ही पढना मन  शांत रहेगा” जब मन शांत रहता है तो सब कुछ अच्छा अच्छा लगता है आज की भाषा मे बोले तो मन पोजिटिव रहता है, मै भी मेरे बच्चो को यह बताना चाहता हुँ कि पढाई के साथ साथ थोडा आध्यात्मिक भी होना चाहिये,क्योकि सफलता प्राप्त करने के लिये पोजिटिव रहना बहुत ही जरूरी है, जब उडना है तो हौंसला भी होना ही चाहिये,

        जब उडने वाली बात हो तो हनुमान जी से ज्यादा उडने वाला कौन हो सकता है लेकिन हम जब आगे बढने को होते है तो हमे यह कदापि आभास नही रहता कि बहुत लोग हमसे पिछे छुटते जा रहे है जब कोई पिछे रह जाता है तो वह मन से बडा ही दुखी होता है कुछ लोग जीवन मे ऐसे भी मिलते है जो हमारी परीक्षा लेना चाहते है कुछ बहुत ही प्रतिस्पर्धा रखते है कई लोग तो बहुत ही खतरनाक तरीके से छुप कर घात पहुचाते है, मै मेरे बच्चो को डरा नही रहा हुँ, बल्कि उन्हे आगाह कर रहा हुँ कि दुनिया मे सब कुछ अपने अनुकूल ही हो ऐसा नही होता है  इसलिये कुछ बाते धार्मिक ग्रंथो से भी ग्रहण कर लेनी चाहिये, 

        यह बात बताने के लिये मैं ने बच्चो को एकबार सुंदरकांड की कुछ घटनाये जीवन से जोड कर बताई थी मुझे विश्वास है उन्हे अवश्य ही याद होंगी फिर भी मै एक बार मेरे बच्चो को नही सभी बच्चो को बताना चाहता हुँ कि जब हम उडने की तैयारी करे तो हमेशा पोजिटिव रहे पोजिटिव का मतलब अपनी क्षमता और अपने लक्ष्य को कभी ना भुले जैसे हनुमान जी कहते है “राम काज किन्हे बिनु मोहे कहाँ विश्राम”  जब जामवंत जी ने हनुमान जी को बल याद दिला दिया तब हनुमान जी अपना बल याद करके चल पडे तो उनके साथ नौ  घटनाये घटती है,जिन्हे मै यहाँ पर प्रासंगिक समझता हुँ, क्योकि सीता माता का पता लगाने के लिये की गई उडान भी मंजिल पाने की उडान से कम नही थी,

        पहली घटना – सुमेरू पर्वत का मिलना, जो कि हमे यह सिखाती है कि आराम करने मौज मस्ती करने  के कई साधन मिलेंगे लेकिन जब तक लक्ष्य प्राप्तनही हो ऐसे मौज मस्ती से दूर ही रहना सही है ऐसी मौज मस्ती को नमन करते हुये शमन करे दमन नही ,

         दुसरी घटना  – सुरसा का मिलना, यह संदेश है कि बहुत ही कम्पिटिशन है और कम्पिटिशन करना भी है लेकिन यदि प्रतिस्पर्धा बहुत ही नाजुक हो जाये तो   और अपने लक्ष्य मे बाधा बन रही है तथा मानसिक परेशानी पैदा कर रही हो  तो हार मान कर उसको छोड कर मन को अपने लक्ष्य मे ही लगाओ, “जब जब सुरसा बदनु बढावा तासु दून कपि रूप दिखावा, शत जोजन जेहि आनन किन्हा अति लघु रूप पवन सुत लिन्हा” छोटा बनने मे कोई बुराई नही है बस सोच हमेशा बडी रहनी चाहिये,
 
        तीसरी घटना  – छाया देख कर खा जाने वाली राक्षसी का मिलना, यह घटना हमे सचेत करती है कि छुप कर धोखा करने वालो से सतर्क रहनाचाहिये और उन्हे छोड ही देना चाहिये

        चौथी घटना - सुंदर सुशोभित लंका दिखाई देना,यह है मंजिल की जगह जो हमे दिखाई तो दे रही है लेकिन बहुत ही  पहरो के अंदर है चारो तरफ पहरेदार लगे है,बहुत ही सुंदर है मोहित करने वाली है,"वन बाग उपवन वाटिका शर कूप वापि सोहहि, नर नाग सुर गंधर्व कन्या रूप मुनि मन मोहहि" इस मंजिल पाने के स्थान पर मौज मस्ती के सब साधन होते है हर प्रकार की सामग्री है मन को भ्रमित करने के लिये, बहुत से पहरे लगे है इसके भीतर घुसना बहुत ही कठिन है लेकिन नामुमकिन नही है,

       पांचवी घटना – मच्छर का रूप बनाना यह बताती है कि छोटा बन कर रहो लोग आपकी प्रतिभा को अपने आप पहचान लेंगे आप अपने मुँह मिठू मत बनो, मौज मस्ती का शमन करो अपने आपको जानने की कोशीश करनी चाहिये

        छठी घटना – लंकीनी का मिलना- मच्छर के समान रूप धारण करने पर भी कुछ लोग मंजिलकी तरफ बढते कदम रोक देते है तब उनका मुकाबला पुर्ण ताकत से करना चाहिये

        सातवी घटना- विभीषण का मिलना,जब हम बहुत ही सरल और सामान्य व्यवहार रखते है तो हमे अपनी मंजिल बताने वाले माईल स्टोन मिलने लगते है,
   
        आठवी घटना – सीता का मिलना बस यही तो है मंजिल मिल ही गई समझो लेकिन बाधा अभी भी आ सकती है लेकिन जब पोजिटिव सोच रहती है अर्थात राम जब साथ होते है तो कुछ भी असम्भव नही होता है अंग्रेजी मे एक कहावत है - everything is possible if god touch is there.
 
        नवी घटना – लंका को जलाना, मतलब सभी बाधाये चीर कर मंजिल प्राप्त कर लेना,


        मेरे  बच्चो ! जब मंजिल मिल जाती है और हम जब अपने लोगो के पास वापिस खुसी मनाते हुये आते है और फिर जो आनंद की अनुभूती होती है उसे बयान करना बहुत ही मुश्किल है

       हम कितने ही अच्छे हो लेकिन समय और परिस्थिती कब और कैसे बदल जाये इसे कोई नही जान सकता, मेरे बच्चो मै तुन्हे कोई बंधन मे नही डाल रहा हुँ, कि पुजा पाठ मे ही लिप्त रहो लेकिन सदैव अपने आपको याद रखो, खुद को जानो और खुद से सिखो, मेरे बच्चे को मैने एक ही बात कही है – “ बेटा ! किसी के लिये तुझे पढने की जरूरत नही है बस अपने लिये ही पढना.. फिर  तुझे  इस  गगन मे इस आकाश  मे स्वछंद उडने  से  कोई  भी  नही रोक  सकता.

Tuesday, 12 January 2016

उठो,जागो,रुको मत ........

उठो,जागो,रुको मत ........

         “उठो, जागो, रुको मत, जब तक लक्ष्य तक ना पहुँच जाओ...” यह एक ध्येय वाक्य है स्वामी विवेकानंद जी का, इन चार शब्दो मे पुरा जीवन रहस्य छुपा हुआ है, हम आज एक एक शब्द को जब परिभाषित करेंगे तो हमे यह पता चलेगा कि इन चार शब्दो मे स्वामी जी किस प्रकार पुरा जीवन का सार भर दिया है,


          1. उठो --- इस शब्द मे एक सामान्य सी बात लगती है बस उठो, लेकिन कैसा उठना क्या अपने स्थान से उठकर चलना ही उठना है, नही आप लोगो को याद होगा कि जब लोग कहते है कि “पैरो पर खडे होकर दिखलाओ तो जमाना तुम्हारा है,” कई लोगो को कहते हुये सुनते है कि वह तो अपने पैरो पर खडा हो गया, मतलब कमाई करने लग गया, अब इसी बात को मै कहता हुँ कि उठो का मतलब अपने आप पर निर्भर होना, स्वावलंबी होना, हम जब खुद का काम खुद करने लग जाये किसी और पर निर्भर ना रहे तो इसका मतलब हम उठ गये है, कहते है “पराधीन सपनेहुँ सुख नाही” स्वामी जी का पहला जीवन विज्ञान यही है हम अपने पैरो पर खडे होकर आत्मनिर्भर हो जाये, अपने स्तर को ऊँचा करले,


           2. जागो --- इसका अर्थ है अपने आप को पहचानना, जब मनुष्य अपने आप को जान जाता है आत्म ज्ञान हो जाता है तो उसे जीवन जीने का लक्ष्य मिल जाता है मकसदमिलने के बाद सब काम छोड लगन लग जाती है “ आज आपके दिलो मे उमड रहा अनुराग, फिर से जाग रे कबिरा जाग” जैसे कबीर जी जाग गये, मीरा बाई जाग गई,”ऐसी लागी लगन मीरा हो गई मगन” जब किसी काम की लगन लग जाती है मन मगन हो जाताहै,  जैसे हनुमानजी को जागृति हो गई, तुलसी दास जी लिखते हैकि जब हनुमान जी जामवंत जी ने कहा-  “राम काज लगि तव अवतारा, सुनतहि भयहुँ पर्वता कारा” हनुमान  जी को जब पता चल गया कि मेरा जन्म किस काम के लिये हुआ है वे पर्वत के समान आकार वाले हो गये, मंजिल पाने के लिये पहले जागना पडता है “अब जाग उठो कमर कसो मंजिल की राह बुलाती है” जाग कर फिर कमर कस लो, मंजिल फिर आपका रास्ता देख रही है,आप को बुला रही है, विवेकानंद जी ने कहा- जागो.. अपने आप को पहचानो , अपना लक्ष्य तय करो, अपनी अंदर छिपी शक्तियाँ पहचानो,


           3. रुको मत – जब अपने आपको पहचान गये लक्ष्य दिखाई दे गया, अपनी अंदर छिपी शक्तियाँ हमे पता लग तब रुको मत अब चलते रहो, पुज्य पिता जी लिखते है –“चले हो अभय क्रांति नुतन मचाते,प्रफुल्लित ह्रदय से सृजन गीत गाते, फिर निडर होकर चलो और ह्रदय मे प्रशन्न्ता लेकर चलो, जब हनुमानजी को पता चल गया कि मेरा जन्म राम काज के लिये ही हुआ है तो फिर विश्राम किस बात का,जब लंका मे जा रहे थे तो समुंद्रभगवान राम जी दूत समझ कर विश्राम करने के लिये कहा लेकिन हनुमानजी ने शालीनता से मना कर दिया, तुलसी दास जी लिखते है “हनुमान तेहि परसाकर पून किन्ही प्रणाम, राम काज किन्हे बिनू मोहे कहा विश्राम” स्वामीजी ने भी यही कहा है,  मंजिल पाने के लिये अनवरत परिश्रम करते रहो, रुको मत ....


            4. मंजिल प्राप्त हो जाये तब तक --  मंजिल मिलना और मंजिल पाना, दोनो अलग अलग बाते है, मंजिले मिल जाती है राह चलते चलते,और मंजिले पाई जाती है कमर कस मेहनत से, जब मेहनती हो गये तो हमे जीना आ गया, जीवन का मतलब समझ मे आ गया,


             
             

            आज स्वामी विवेकानंद जी की जयंति है, उन्होने जो कहा वह मै ने समझा और मै ने जो लिखा वह आप लोगो को कितना समझ मे आया आप लोगो के कमेंटस से ही पता चलेगा, आप भी आज उस महान विभूति को एक बार अवस्य याद करना और उनकी तरह स्वस्थ शरीर और प्रशन्न मन युक्त जीवन जीने की कौशीश करना, उठो, जागो, रुको मत .......
     



Sunday, 27 December 2015

अब मेरी बारी है ...!

अब मेरी बारी है ...!


         मै पहली बार गांव से शहर मे आया था मुझे मेरे बडे भाईसाहब शहर मे छोड कर गये थे, मेरा मन नही लगता था उस वक्त मेरी उम्र होगी मात्र तेरह साल मै नवी कक्षा मे पढता था, मै कक्षा मे चुपचाप ही रहता था, सभी लोग मुझे अकेला देख कर कुछ हंसी मजाक मे मेरा मन लगाने की कोशीश करते थे,लेकिन घर और माँ बचपन मे कुछ ज्यादा ही याद आते है, मन की बात कोई भी सुनने वाला नही था, 

        बापुजी ने बस मे बिठाते समय कहा था – बेटा समय अनुसार सब कुछ बदल जाता है, शहर मे तुझे दोस्त भी मिल जायेंगे और मन भी लग जायेगा, यदि कुछ पढ लिख लेगा तो तेरा जीवन सुधर जायेगा, जीवन सुधारने के लिये मन लगाने का प्रयास कर रहा था, इंटरवेल मे सभी बच्चे खेल रहे थे, लेकिन मै अकेला सिढीयो मे बैठा था तभी एक लडका मेरे पास आया और मेरे कंधे पर हाथ रख कर मुझे कुछ दिलासा देने के हिसाब से बोला- क्या घर की याद आ रही है ?,

        मै उसकी बांते सुनकर शायद रोने ही लगता लेकिन बापुजी की कही हुई बात याद आ गई कि दोस्त अपने आप ही बन जायेंगे, मुझे ऐसा लग रहा था कि अब यह दोस्त आ गया है, और यही मेरा दोस्त बन जायेगा, उसने मुझे बहुत ही प्रेम से कई बाते समझाई और  मेरा हाथ पकड कर मुझे घुमाने ले गया,वह इसी  शहर मे रहता था, वह अपने परिवार के साथ ही रहता था,  इंटर्वेल के बाद कक्षा मे भी मेरे साथ ही बैठा, मेरा मन कुछ हल्का होने लगा था,

        अब रोजाना वह मेरे पास ही बैठता और पढता था, हम दोनो सारे सारे दिन साथ ही रहते थे, अब ऐसा लग रहा था कि कठिन समय बीत गया है, जीवनसबसे बडा दुख अकेला पन ही होता है,  मै अब पुरे आत्म विश्वास से भरने लगा था, दोस्त मुझे अपने घर भी ले जाता था,वह इसी शहर का रहने वाला था मै किराये पर मकान लेकर रहता था, समय बीतता जा रहा था, और हमारी दोस्ती प्रगाढ होती जा रही थी उसके घर वाले भी खुश थे कहते थे कि हमारा बच्चा तेरे साथ रह कर होशियार होता जा रहा है वास्तव मे वह पहले एक बार फैल हो गया था, वैसे मै ने ऐसा कुछ भी नही किया था बस मेरे साथ रह कर उसका तथा उसके साथ रहकर मेरा  मनोबल बढ गया था और वह होशियार होता जा रहा था, और मै निर्भय,  वह गरीब तो नही था लेकिन उसकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नही थी, लेकिन था बडा स्वाभिमानी, मेरा बहुत ही अच्छा और सच्चा दोस्त था, और अभी भी है

         अब उसकी शादी भी हो गई है, दो बच्चे भी हो गये है, ये कोई विशेष बात नही है मेरी भी शादी हो गई है और मेरे भी दो बच्चे हो गये है, उसने बीएड करली और मैं ने बी ए एम एस कर लिया है, उसने बीएड किया तब वह बहुत ही आर्थिक कमजोरी से गुजर रहा था उस वक्त मै ने उसका बहुत ही मनोबल भी बढाया और उसकी आर्थिक स्थिती को भी मजबूत करने की कोशीश की थी लेकिन यदि मन मे कोई कमजोरी हो तो पढाई ढंग से नही हो पाती, और वह भी बस बीएड पास करके आ गया और कम नम्बर के बिना उसकी नौकरी नही लग पाई 

        अब वह एक प्राईवेट स्कूल मे पढाता है और बी पी, सुगर, हेवी वेट, और अनिद्रा का मरीज हो गया है, रोजाना मुठ्ठी भर कर दवा खाता है, जब भी फोन पर बात होती है बहुत ही खुस होता है और मुझे भी बडी खुसी होती है, मुझे उसके साथ बिताये बचपन के सभी दिन याद है लेकिन वह शायद भूल गया है,क्योकि उसकी यादास्त बहुत ही कमजोर हो गई है,

        उसने उस वक्त मेरी बहुत मदद की थी मुझे उसकी मदद करनी चाहिये अब मेरी बारी है...




Sunday, 22 November 2015

***महारत हासिल करनी है ....

***महारत हासिल करनी  है ....


        मुझे लिखने का बडा ही शौक है मुझे जब भी वक्त मिलता है मै लिखना ही पसंद करता हुँ लेकिन मेरा लिखा हुआ लोग पढते है या नही मुझे मालूम नही था जब मैं ने ब्लोग पर पोस्ट लिखना शुरू किया और लोग मेरे फोलोवर बनने लगे तब मुझे पता लगा कि मेरी लिखी हुई बांतो को लोग पढते है

        मै ने कल ही किसी दार्शनिक का कथन पढा था कि “यदि आप अपना मन पसंद काम कर रहे है तो आपको कही भी धन कमाने के लिये जाने की जरूरत नही है, आप लगातार अपना काम मन लगा कर करते रहे,और उस काम मे महारत हासिल करले, धन अपने आप आपके पास आ जायेगा”
मुझे यह बात बहुत ही पसंद आ गई, और मै ने इसे जीवन मे उतारने का मन बना लिया है, 


        मुझे ऐसी बहुत सी बाते याद है जो लोग किसी काम मे लग जाते है और उस काम  के विशेषज्ञ बन जाते है तो लोग उनको खोजते हुये आ जाते है, इसका एक उदाहरण अलवर के कम पढे लिखे एक व्यक्ति का  है उसे अपने मनपसंद काम ऐंड्रायड मोबाइल के लिये ऐप्पस बनाने  मे जब  आनंद आने लगा और उसके पास कोई खास सुविधाये नही  होने के बावजूद वह काम को करने लगा और  वह अपने काम का माहिर हो गया तो उसने वह करके दिखा दिया जिसे पढे लिखे इंजीनियर भी नही कर सके थे,काम  मे माहिर होने पर जब उसके बनाये ऐप्स को प्रधानमंत्री जी से सराहना मिली और रातो रात वह सुर्खियो मे आ गया और धन भी उसके पास चला आया,

         अब पता यह करना होता है कि मुझे सबसे ज्यादा पसंद क्या है इसके लिये ध्यान लगाना पडेगा कि क्या  काम सबसे ज्यादा अच्छा लगता है, कहते है प्रकृति मे कोई भी वस्तु बिना काम के नही बनाई गई है संस्कृत मे एक श्लोक है “अमंत्रम अक्षरम नास्ति, नास्ति मूलमनोषधम, अयोग्य पुरूषो नास्ति ......” मतलब यह है कि  सभी के लिये कोई ना कोई काम जरूर तय किया हुआ  है जब आप और हम अपना मन पसंद काम करते है तो उस काम मे प्रकृति अपना पुरा सहयोग करती है, कहते है कि “जब किसी काम को सिद्धत से किया जाता है तो पुरी कायनात उसे पुरा करने  मे सहयोग करती है”
 
         कुछ लोग जीवन भर भटकते रहते है उन्हे समझ मे ही नही आता कि मुझे क्या करना है और क्या नही जीवन निकल जाता है और बस हतासा हाथ लगती है, फिर कई गलत कदम उठा कर जीवन को नर्क बना लिया जाता है जिस काम मे यदि सफलता नही मिल रही है तो इसका मतलब यह है कि उस काम मे आपकी रूचि नही है जब रूची नही होगी तो काम को सही ढंग नही किया जा सकता इसी लिये कहते है  कि “असफलता का मतलब कि सफलता के लिये प्रयास पुरे मन से नही किया गया” बस यही बात है कि काम मे दिल नही लगा पाये,

         मेरे पिताजी कहते थे कि “बेटा काम वही करो जो तुम्हे आनंद की अनुभुति करवाये” मतलब साफ है काम मन पसंद का करना चाहिये, अब मुझे कुछ कुछ समझ मे आ रहा है कि मन पसंद काम मे महारत हासिल करनी है

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Friday, 30 October 2015

अब ढींगे हाँकना बंद करो...

अब ढींगे हाँकना बंद करो....


          मै एक बच्चे को, जो खाना नही खाता था उसे भूख का महत्व समझा रहा था कि जब भुख लगती है ना, तो आदमी कुछ भी कर सकता है महाभारत के एक प्रसंग का भी जिक्र किया जिसमे बताया गया था कि जब महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया था तब राजमाता गांधारी युद्ध भुमी मे विलाप कर रही थी भगवान कृष्ण ने बहुत मनाया और समझाया कि घर चलो अब विलाप करने से कुछ नही होगा लेकिन वह नही मानी,वही पर रोती कलपती रही रात होने लगी और भूख ने भी अपना प्रभाव दिखाना शूरू किया और गांधारी भूख से तडफने लगी लेकिन अब उस युद्ध भूमी मे भोजन कहा था चारो तरफ लाशो के ढेर पडे थे गांधारी भूख से तडफ रही थी वह उठी और भोजन की तलाश कर ने निकली उसे बेर की खुशबू आई वह झाड के पास गई और बेर तोडने के लिये हाथ बढाया लेकिन हाथ नही पहुँचा, तब उसने अपने बच्चो की लाशो का ढेर लगाया और उस पर खडी होकर बेर तोडने लगी, तभी भगवान कृष्ण वहा प्रगट हो गये और भूख का महत्व समझाया,

          इतना कहने के बाद मै बच्चे को समझाने लगा कि भूख बहुत खतरनाक होती है अब बच्चे की बारी थी बोला – अंकल अब ढींगे हाँकना बंद भी करो ये फालतू के  उदाहरण देना बंद करो हम इन फालतू बातो से बहकने वाले नही है आप मुझे ये बताओ कि वह अंधी औरत उसे कुछ दिखता नही वह बेर के झाड के पास कैसे गई ? वहा मृत शरीरो की बदबू आ रही थी तो उसको बेर की खुशबू कहा से आई, कई दिनो से युद्ध चल रहा था तो कितनी सेनाये वहा भगदड मचा रही थी फिर वह झाड कैसे बच गया ये सब झुठी बाते है फालतू बातो से हम जैसे बच्चे अब मानने वाले नही है,और कोई बात हो तो बताओ, मुझे ऐसे लगा कि ये कितना सोचते है इन्हे अब कितनी समझ आगई है हर बात का विश्लेषण करते है ये एक अच्छी बात थी

          यह एक छोटा सा उदाहरण था जो यह इंगित करता है कि ये कितने तेज और समझदार होते जा रहे है किसी भी सुनी सुनाई बात पर भरोसा नही करते, इनमे कितनी समझ आ गई है लेकिन एक जगह ऐसी है जहाँ हम हर बार मात खाते है वहा एनालाईसिस नही कर पाते वह जगह है हमारे चुनाव ...हमारे नेता...., चुनावो मे हमेशा मात ही खाते है सब जानते है लेकिन हर बार धोखे के  अलावा हमे कुछ भी नही मिलता,

          लेकिन अब आज का युवा इस बात को भी  बडी गंभीरता से ले रहा है, वह जान गया है अब फालतू ढींग हाँकने वाला हमे बार-बार धोखा नही दे सकता, अब बदलाव सम्भव हो सकता है एक बात सब मे कोमन नजर आती है कि सभी जन इस फालतु प्रपंच से निजात पाना चाहते है इन ढोंगी बाबाओ का फालतू प्रवचन और इन नेताओ के झुठे आश्वासन,झुठे भाषण,झुठे आडंबर से तंग आ गये है अब सब लोग यह कहने की हिम्मत जुटा चुके है और कहने लगे है कि – अब ढींग हाँकना बंद करो.....   
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Friday, 4 September 2015

झूठ बोलना जरूरी है ?

झूठ बोलना जरूरी है ?


          बचपन से एक बात सुनते आये है कि सत्य बोलो,सच्चे का बोलबाला झुठे का मुँह काला, हमारे संस्कारो मे यह बात कुट कुटकर भरी गई है कि हमेशा सत्य ही बोलना चाहिये, भारत देश मे तो कहानिया भी सत्यवादी हरिश्चंद्र की सुनते सुनाते आये है, महात्मा गांधी ने भी सत्य पर बहुत ही प्रयोग किये है, फिल्म वालो ने भी गांधी के सत्य पर आधारित फिल्म भी बनाई है, मेरा मतलब कि चारो तरफ अभी भी सत्त्य का बोलबाला है, कोर्ट परिसर मे भी लिखा होता है “सत्यमेव जयते" 

          लेकिन यह सब क्या वास्तव मे होता है,आज कल सत्य बोलना एक अपराध हो गया है,मैं ने लोगो को झुठ बोलते, झुठ जीते, झुठी शान के लिये मरते मारते देखा है कल की ही बात है, मै ने एक राजनीति ग्रुप पर यह बात कह दी कि “आज कल नेता लोग एक भयंकर राजनीति कर रहे है कि पहले लोगो को डराते है फिर कुछ आशाये दिखाते है ,फिर बहलाते है फुसलाते है फिर उल्लू बनाकर लूटते है वोट या फिर .... चंदा” लोगो का ऐसे रियेक्शन आया जैसे मै ने उनके किसी खास अंग पर जलती छड रख दी हो, यह सत्य है लेकिन सत्य को फैशन के तौर पर यदि काम मे लेते है तो सही है यदि सत्य को जीवन मे कहने लगे तो आपको नुकशान हो सकता है, संस्कृत मे एक श्लोक है “ सत्यम ब्रुयात, प्रियम ब्रुयात, न ब्रुयात सत्यम अप्रियम” मै ने इस नियम की अवहेलना कर दी, आज के जमाने मे चाहे न्यायालय के आदेश की अवहेलना भले ही कर दो लेकिन यदि सामाजिक नियमो को तोडोगे या अवहेलना करोगे तो फिर देखलो क्या होने वाला है, मेरा नाम ग्रुप मे से वे लोग हटाते उससे पहले ही मै ने ग्रुप छोडने मे ही भलाई समझी,यह एक मामूली सी बात है लेकिन ऐसी हजारो बाते है जिससे यह लगता है की झुठ बोलना जरूरी है, राजनैतिक पार्टियो मे तो बहुत लोग है जो सत्य बोलने के चक्कर मे घनचक्कर बने घूम रहे है बेचारे गांधीजी की पार्टी का  तो सबसे बुरा हाल है वहा तो झुठ बोलना बहुत ही  जरूरी है,

          मेरे एक मित्र है “बल्डु” , जब उसको यह बात पता चली की डा.कौशिक के साथ किसी ने चुँ चपट करली तो चला आया मिलने, मै ने सोचा कोई सांत्वना देगा,कि कोई बात नही तु हमेशा सत्य ही बोलना यह अच्छी बात है सत्य की हमेशा विजय होती है,लेकिन उसने ठीक इसके उल्टे मुझे डाटना शुरू कर दिया कि क्यो सत्यवादी बना फिरता है तु जानता भी है कि सत्य क्या है , वह कुछ आध्यात्मिक होकर बोलने लगा-“ सत्य की खोज मे हजारो साल से संत महात्मा भटक रहे है अभी तक उन्हे मालूम नही चला कि सत्य क्या है और एक तु है कि चला है सत्य की पताका फैराने के लिये” मै कुछ बोलता उससे पहले उसने अपनी ज्ञान पिटारी खोल दी और बोलने लगा – आज कल झुठ बोलना जरूरी है ,तुझे मालूम नही है मेरा एक्सीडेंट हो गया था पूलिस केस हो गया था और चालान पेश होने के बाद हम वकील से मिलने गये थे और एक वकील जो तेरे जैसे टुटी-फुटी सत्य झाडता है उसने कहा था कि इस क्लेम को पास कराने मे छ से बारह साल लगेंगे और हमने वह वकील ना करके जिसने साफ साफ झुठ कहा था कि महिने भर मे आप लोगो का क्लेम पास करवा दुंगा और हमने उसे वकालत नामा भर कर दे दिया था, 
           मुझे कुछ याद आ रहा था कि वह क्लेम दस साल बीत जाने के बाद अभी तक भी पास नही हुया है,मै ने सहमति मे सिर हिलाया, बल्डू फिर बोलने लगा – अभी साल भर भी नही हुआ मकान बनाये कारीगर ने तीन चार लाख का एस्टिमेट बताया था और कहा था कि काम शुरू करदो लेकिन कितना लगा? पुरे सात तो लग गये है और काम तो अभी बाकी है, तेरे को कुछ याद नही रहता तु खुद कई मरीजो को सही सही कह देता है कि इस बिमारी को ठीक होने मे दो तीन साल लगेंगे तो क्या रोगी तेरे से इलाज लेता है तुझे भी झुठ बोलना ही पडता है कि देखो रोग तो थोडा गम्भीर है दस पंद्रह दिन मे आराम आ जायेगा फिर इलाज चलता रहता है, चलता रहता है कई बार तो मरीज ही निकल लेता है बेचारा, लेकिन इलाज खत्म नही होता, 
          मेरे दोस्त ! आजकल सत्य बोलना सिर्फ दिखावा है वास्तव मे तो झुठ का ही बोलबाला है सत्य का मुह काला है , कही भी चले जाओ, घर से लेकर ओफिस तक, गांव से लेकर शहर तक, पंचायत से लेकर पी एम ओ तक, आकाशवाणी से लेकर दुरदर्शन तक, सब जगह झुठ का ही परचम फैला हुआ है,लोग तो मंदिर मस्जिद जहा  जगह मिले वही पर  झुठ बोल देते है आज कल नेतालोग धार्मिक लोग, सामाजिक लोग, जिसको देखो वह झुठ बोलने मे लगा है 
          मेरे मित्र ! आज कल लोग झुठ  फेंक फेंक कर देश के राजा तक बन जाते है, अरे भाई लोग सत्य की खोज मे लगे है, तु भी उसे ढुंढ यदि मिल जाये तो मुझे भी बताना, लेकिन लोगो से पंगा मत लिया कर, इतना कह कर बल्डू ने विराम लिया, कुछ देर और कई बाते समझा कर चला गया,
          मै सोचने पर मजबूर हो गया कि सत्य बोलना क्या वाकई गलत है मेरा दिमाग भी इस चिंतन मे लग गया कि सत्य क्या है किसी को भी मालूम नही है,सत्य क्या समय के अनुसार बदल जाता है ? क्या सत्य बोलना मजबूरी हो गई है ? क्या लोगो ने सत्य पर भरोसा करना छोड दिया है ?  जहाँ तक मेरा मानना है समय सत्य है जो आत्मा को मालूम है झुठ बोलने वाला भी जानता है कि वह झुठ बोल रहा है लेकिन फिर भी झुठ बोलना तो बहुत ही जरूरी है और मजबूरी भी.., क्या सच्ची  मे झुठ बोलना जरूरी है ???        


Thursday, 16 July 2015

मन क्यो भटक रहा है ....?

जब मै किसी भी व्यक्ति से मिलता हुँ तो वह अपने दुःखो का वर्णन करता है बार बार एक ही बात दोहराता है कि "मै बडा दुःखी हुँ" , या फिर कहेगा कि "ठीक हुँ पर आप जैसा सुखी नही हुँ" यह एक आदमी की सोच नही है यह सब लोगो की सोच हो गई है, सब कुछ है फिर भी कुछ भी नही है,
 महात्मा लोग कहते है कि यह सब मन का भटकाव है मन मे ही तरह तरह के सुख और दुख की तरंगे निकलती रहती है आधुनिक विज्ञान भी इस बात का समर्थन करता है कि ये सब मन मे उठने वाली तरंगे है इन को शांत करने से सुख  दुख का अहसास नही होता,
चिकित्सा करते समय कई बार ऐसी दवा का प्रयोग किया जाता है जो दर्द का अहसास नही होने देती, अब देखो दर्द तो है लेकिन दर्द का अहसास नही हो रहा क्योकि नर्वस सिस्टम को बंद कर दिया गया मस्तिष्क तक सुचनाये नही पहुँच रही इस लिये दर्द नही हो  रहा है, इसी प्रकार मन का भी यह ही हाल है हम जब मन की परिवेदनाये मस्तिष्क को पहुँचाहते है तो फिर सुख और दुख उत्पन्न होते है
"यह सब कहने की बाते है कोई भी इस जगत मे नही है जिसका मन भटकता नही हो"मेरे एक मित्र  ने मुझसे तत्काल ही पुछ लिया -"क्या आप जानते है ऐसे किसी भी व्यक्ति को जो सुख दुख से दूर हो ?" मै सोचने लगा कि मेरी जान पहचान मे तो कोई भी ऐसे व्यक्ति का सामना नही हुआ फिर लोग क्यो हजारो उदाहरण देते है कि फलाँ आदमी ऐसा था, इसकी क्या वजह है , मै भी बैठा बैठा सोचता रहता हुँ कि कौन होगा ऐसा जो सुख दुख से दूर हो,
क्या परमात्मा के नाम पर दुकान चलाने वाले ऐसे होते है,या फिर जो पागल हो गये वे लोग ऐसे है, पागल हो सकते है क्योकि उनका मस्तिष्क  काम नही करता होगा शायद,  क्योकि दिमाग की क्रिया खराब हो जाती है तभी तो वह पागल कहलाता है और महात्मा जो दुकान चलाते है वे भी ज्यादातर भांग या गांजा के नशे मे धुत्त रहते है इसलिये उनका दिमाग भी कम  ही काम करता है ,इस लिये दिमाग तक परिवेदनाये जाती नही है और सुख दुख का अहसास होता ही नही है चाहे ये घटना कुछ देर तक ही क्यो ना, होती जरूर है , तब तो सभी नशेडी भी इसी श्रेणी मे आ जाते है, हो सकता है लोग इसीलिये शराब जैसे नशीले पदार्थो को पीते हो, कि इस लफडे से कुछ देर तो दूर रहे ,इस प्रकार की दवाईयाँ भी आती है जो सुख दुख का अहसास नही होने देती, लेकिन ये सब तो तरंग को कुछ देर ही शांत करती है कोई ऐसा है  जो कि हमेशा के लिये तरंगो को शांत कर चुका हो,
 कोई ना कोई तो होगा ही जो सुख दुख से दुर है क्योकि जब कोई भी नही था तो इतना सब प्रवचनो मे क्यो कहते है प्रत्येक महात्मा के  प्रोग्रामो मे यह बात कही जाती है क्यो ? इस बात का जबाव किस के पास होगा कौन बतायेगा ये सब कि मन क्यो भटक रहा है ....? और कैसे शांत होंगी ये मन की मस्तिष्क तक जाने वाली तरंगे .....?