Wednesday, 14 January 2015

बल्ढु बना सरपंच

एक बार बल्ढुराम ने सरपंच बणबा की ली ठान,एक महिना पहल्या ही गुड बांट कर सरपंच लियो मान
दारू प्याणु शुरू करयो आठ दस की एक मंडली बनाई,कयाँसी आपाँ सरपंच बणा मन ही मन कई जुगत लगाई
बल्ढु सोच्यो प्रचार करुंगो और माहोल जोरको बनाउंगो,औरकोई खड्या होसी जिका न डरा के पाछो बिठाउंगो
कोई न धमकाउंगो,कोई न समझाउंगो,कोई न दारू पिलाउंगो, जो कतई ना मानेगो बीका पगा म पड जाउंगो
(2)बल्ढु के साथ वाला बल्ढु को प्रचार युँ करबा लाग्या,सरपंच तो बणसी या ना बणसी पण म्हारा भाग जाग्या
दारू म्हान रोज पिलाव गाडीयाँ मे घुमाव है,सरपंच चाहे ना बणेलो पण म्हान खुब खिलाव है
गुंडो है लफंगो है गयोबित्यो बेकार है, थप्पड देकर काम कराँ सकाँ हा यो आपणो अधिकार है
अ र गांव को टाबर है, गांव मे रहबालो छोरो है,अ ब क जिताज्यो बेचारो पंद्रह साल सूँ खड्यो होरयो है
कर्जा म डूब रियो है,हारया बर्बाद हो जावेलो,गांव को काम क र या ना क र ,खुद को घर तो बनावेलो
एक वोट का दान मे थारो  के बिगड जावेलो,गरीब घर को छोरो है,जिंदगी भर थारा गुण गावेलो
(3)एक ओडियो केसेट भी बल्ढु ने जैपुर सूँ भरवाई,बडो नेतो गांव मे आयो जणा बीच चोक म बजवाई
भाया न भाभी न स न ईयाँ कहणु है , वोट आपणो मिलकर बल्ढुराम  ही देणो है
(4) एक दिन बल्ढु भी भाषण की खूब झडी लगाई,ई गांव की खातिर मै अपनी जान की बाजी लगाई
कुआँ पर फर्जी बिजली लगार पानी की समस्या मिटाई,सेवा समीति बना कर बईमानी की हद पार कराई
बिजली की चोरी सिखाकर मै गांव को धन बचायो,बैंक सूँ लोन दिलार था न सरकारी पिसो खाबो सिखायो,
एक जणो बिदक र बोल्यो- अ र तेरे कन्न के सामान है , तु तो भाया लूट क खागो,तु तो जन्म जात बेईमान है
मै बेईमान था नही थे लोग ही मन्न बणा दिया,मै तो सीधा सादा हू मैने तो आप के घर का कचरा भी उठा दिया
रही बात सामान की मैने आगे-आगे दिखाया है,श्मशान घाट का हेंडपम्प मेरे घर के सामने लगवाया है
एक जणो बोल्यो-तु क्या उस हैंडपम्प से पानी पी रहा है,अरे भैया तूतो जिंदो की बस्ती मे मुर्दो की तरह जी रहा है
बल्ढु बोल्यो-छोडो ई बात नअब मै थाको हुकुम बजाउंगो,थेतो मन्न एकबार जिताद्यो,ईगांव ने आदर्शगांव बनाउंगो
(5)बल्ढु को विपक्षी नेतो भी रात्यूँ प्रचार करयो और करवायो, तीसरा नेता के खातिर ऐन टेम पर फार्म हटायो
बल्ढु को भाग खुल गो हनुमान जी कृपा भली करी,सारो गांव बल्ढु कानी होग्यो,बल्ढु की साग्योडी पार पडी,
कदे नही मंदिर मे जाबा लो चुनाव क दिन माथा मे सिंदूर म लगायो,
ढाणी सारी विपरीत थी ,पण गर्ज पर गधा न भी बाप बनायो
(6)चुनाव जीतने के बाद बल्ढु की नियत गोता खाने लगी,बल्ढु की किस्मत के साथ साथ्या की किस्मत भी जगी
बल्ढु बोल्यो-पण मन्न ज वोट ना दिया वा की अब खैर नही,एक जणो बोल्यो-भगवान के घर देर है अंधेर नही,
भाग्य सूँ जित्योडो हो ना कोई बल्ढु को उत्सव मनायो,धूमधाम सुँ दाम देकर खुद ही खुद को जुलूस निकलवायो,
पढ्या-लिख्या साथ्या सूँ,बढिया सो भाषण लिखवायो,बिना समझ्या ही बी भाषण न बल्ढु यूँ फरमायो
सुरज बदले चंदा बदले बदले चाहे जगत तमाम,यो बैईमानो को बाप ,ना बदलेगो बल्ढुराम
मेरा नाम की अब मोहर बनाओ और लगाओ,मेरा साथ्या न पावर देता हू चाहे आम चोक का भी पट्टा बनाओ,
बल्ढु की बाताँ सुनकर लोगाँ न हंसी आई भारी, मूसल के ध्वजा बांध दी,गांव की मति गई मारी,
बल्ढु का प्रचारी था ब मायँ-मायँ यू फुसफुसाया,बैरी जीतगो म्हे तो लोगाँ न बहुत भडकाया
बिल्ली का भाग को छिको टुटनो थो सो टुटगो,थे आज सुँ या समझल्यो,गांव को राम रूठगो,
(7)बल्ढु सरपंच बण्या पाछ ऊची उडान लगाई,प्रधान,विधायक और सांसद बणबा की योजना बनाई
हाथ उछाल-उछाल कर खूब भाषण देबा लाग्यो,इता मे ही बल्ढु को बापु बी का कमरा म आग्यो
बोल्यो-लाग है छोरा म ओपरी छाया आगी,छाया की बात सुनकर घरवाली आई भागी
उसने बल्ढु  को जोर से झिंझोडा और हिलाया,नींद मे सोते हुये को पानी डाल कर जगाया
बोली-अजी ये हाथ पांव नींद मे ही क्यो हिला रिया हो,ला ग है थे बारात को सपनो देखा कर नाच रिया हो
आंख्या खुली जणा मति ठिकाण आई, पल भर मे ही गुल होगी बल्ढु की सारी सरपंचाई

Sunday, 4 January 2015

पी के मतलब पाकिस....न ?


हमारे एक परम मित्र है बल्ढूराम, एक नम्बर के घोर विरोधी , किसका विरोध करना है और किसका नही करना ये उन्हे नही मालूम लेकिन विरोध करना है बस, जो भी थोडा सा चर्चा मे हो जाये बस विरोध शुरु,चाहे जोधा अकबर सिरियल हो चाहे जय बजरंग बली दोनो का उन्होने विरोध दर्ज करवाया है दोनो मे गलत कहानी दिखाई जा रही है वह महाशय घर मे अपने माता पिता का विरोध करने से भी नही चुकते,
आज कल तो बडे ही विरोधी स्वर निकल रहे है उनके, एक फिल्म आई है पी के, जब इस फिल्म का पोस्टर आया था तब भी इन्होने घोर विरोध प्रगट किया था लेकिन इनका प्रचार तो हुआ नही उल्टा फिल्म का ही प्रचार हो गया अब फिल्म आ गई है इसलिये इसका विरोध करना है
मुझे सुबह सुबह ही मिल गये निवृत होकर आये थे मैंने टोक दिया – “भाई ! ये सब क्या है ? आप बाहर शौच के लिये जाते हो मोदी जी तो “सब को शौचालय” की बात करते है और आप है कि ......” मै और कुछ कहता इससे पहले ही बल्ढू जी बोल पडे – “यार आप भी क्या पुरानी बात लेके बैठे हो कोई ताजा बात करनी चाहिये”, मैने पुछा – “ये पुरानी कहा से हो गई और ताजा क्या है” , बल्ढू बोला – “मोदी जी को ये शौचालय वाली बात कहे दो तीन महिने हो गये और ताजा ताजा बात तो ये हिंदुओ की खिल्ली उडाने वाली फिल्म पी के है” बल्ढू थोडा क्रोध मे आ गया फिर से बोला – ये जो पी के है ना, इसका मतलब जानते हो क्या है ? मैंने कहा – नही भाई , “ इसका मतलब होता है पाकिस्तान “ मैने पुछा- “वो कैसे ?” वह बोला – “जैसे आर जे का राजस्थान, जी जे का गुजरात डी एच का दिल्ली वैसे ही पी के का पाकिस्तान” मैने उसको समझाया – “पी के का मतलब पियक्कड से है, इसका गलत अर्थ मत निकालो यार ये तो दंगा फसाद करवाने वाली बात है”, वह चिल्ला पडा – “हो जाने दो दंगा इससे क्या होता है हम क्या हमारे भगवान का मजाक उडाने की इजाजत ऐसे ही दे देंगे , नही देंगे,हम इस फिल्म को बंद करवा कर ही रहेंगे”, मैने फिर से पुछा – “इस फिल्म मे ऐसा क्या दिख गया, जो तुम इसकी एक देश से तुलना करने लग गये” ,वह बिफर पडा – “क्या हमारे देश के नेता जी युँ ही किसी पे इल्जाम लगायेंगे कि इस फिल्म मे अरब देशो तथा पाकिस्तान की गुप्तचर संस्था का पैसा लगा है,और फिल्म को देखो तो पता लगे इसमे पुरा उसी देश का विवरण लिखा गया है, एक नंगा पंगा पान चबाता आदमी किसका प्रतीक है बताओ, ये पुरे उसी देश का प्रतीक है,” मुझे थोडी हंसी आ गई, बल्ढू गुस्से से बोला- “ये हंसने की बात नही है, आगे देखो वह राजस्थान से हमारे देश मे प्रवेश करता है उस देश के लोग भी इधर से ही घुसपैठ करते है , और भोजपुरी बोलता है वे लोग भी अपना अड्डा यु पी को ही बनाते है और दिल्ली मे रहता है” , बल्ढू फिर मुझसे पुछता है- “कौशिक जी ! आप बताओ लगभग फिल्मे मुम्बई की पृष्टभूमी पर ही बनती है ये दिल्ली पर क्यो ?,
 मैने उसे समझाते हुये कहा – “ये महज इत्फाक है ये कोई कारण नही है”
मैने बल्ढू को फिर से समझाने की कोशीश की – “और सुनो इस फिल्म की कहानी एक बहुत ही सुलझे हुये लेखक श्री अमिताब जोशी ने लिखी है और वो इसी देश के हिंदु है वो अंटशंट बाते क्यो लिखेंगे”, बल्ढू थोडा नरम पडा फिर बोला – “वो तो ठीक है लेकिन इसमे हिंदु धर्म की ही खिल्ली उडाई है हमारे बाबा , हमारे मंदिर, हमारे भगवान सब हमारे ही उनका कोई भी नही”, समझाते हुये मैंने कहा – “भाई ऐसा कुछ भी नही इस फिल्म मे सभी धर्मो की बात कही गई है किसी का धर्मांतरण वाला मुद्धा उठाया है , किसी का महिला शिक्षा का मुद्धा बताया है,” बल्ढू बीच मे ही बोल पडा – “लेकिन उनका मस्जिद तो सिर्फ बाहर से ही बताया है हमारा मंदिर मुर्ति सब का मजाक उडाया है हम तो इस बात का विरोध करेंगे”,अब मुझे थोडा गुस्सा आ गया थोडी ऊची आवाज मे मै बोलने लगा – “मजाक भगवान का नही सिर्फ पाखंड का उडाया है कुछ समझ मे आ रहा है तुझे”, मुझे क्रोध मे देख कर बल्ढू चुपचाप सुनता रहा मै उसे सुनाने लगा- “दयानंद सरस्वती जी ने भी पाखंडी एवम ढोंगी लोगो के लिये एक पताका फहराई थी “ पाखंड खंडन” ये समझ ये पी के भी उसी पाखंड खंडन का ही रूप है जा अपनी सोच बदल ...” मै और कुछ बोलता इतने मे ही मोहल्ले के कुछ बच्चे चिल्ला चिल्ला कर बोलने लगे ... और शौचालय बनवा .... सोच बदल .... और शौचालय बनवा…….. इति.  
       



Friday, 12 December 2014

अच्छे लोग ..!

                आज अच्छे लोगो की ही बात करते है , सबसे पहले उन लोगो की बात करते है जो हम सब को यात्रा के दौरान मिल जाते है बस मे भयंकर भीड होती है खडा होने की जगह भी नही होती इतने मे कोई उठ कर कहता है "सर ! आप यहाँ बैठ जाये"  ऐसा मेरे साथ बहुत बार हुआ है आप लोगो के साथ भी ऐसा जरूर हुआ होगा, कई ऐसे लोग भी है जो कभी किसी महिला को, कभी किसी बुढे लोगो को, कभी किसी बीमार लोगो को अपनी सीट दे देते है लेकिन हम ये बाते ज्यादा याद नही रख पाते जल्दी ही भूल जाते है,ऐसे कई उदाहरण देखने को मिल जायेंगे कभी बस स्टेंड पर पानी पीलाते लोग,कभी सर्दियो मे कम्बल बाँटते लोग, सब अच्छे लोग ही तो है,
             दुनियाँ मे अच्छे लोगो की कमी नही है,लेकिन कब कौन किसके लिये बुरा बन जाये कह नही सकते तुलसीदास जी सुंदर कांड मे लिखते है जो कार्य सीता के लिये शगुन हो रहे थे वे ही कार्य रावण के लिये अपशगुन हो रहे थे,इसलिये कई अच्छे काम किसी किसी के लिये बुरे बन जाते है,चिकित्सको का ओपरेशन करना अच्छा काम है लेकिन जहरीली दवा से मौत को प्राप्त करना बुरा काम है सरकार जब भी अच्छे काम करती है उसका उल्टा ही असर होता है सरकार मँहगाई कम करती है तो साहुकार के घर मे मातम और मँहगाई कम ना करे तो मजदूर के घर रोना धोना शुरू,अब सरकार ने एक सपना दिखा दिया "अच्छे दिन आने वाले है"
              अच्छा काम कुछ लोग तो लोगो को दिखाने के लिये करते है, कुछ लोग अहंकार पुष्ट करने के लिये करते है और कुछ लोग इंकमटेक्स बचाने के लिये भी करते है,हर अच्छे काम का अपना अपना क्षेत्र है आज कल एक अच्छा काम जोरो पर है" सफाई करो" ,पहले ये काम "आप"कर रहे थे और अब मोदी जी कर रहे है इसका बडा असर हुआ है कोंग्रेस साफ हो गई , और तो और कई पाखँडी भी साफ हो गये ,और कई सफाई की लाइन मे है,जल्दी ही उनका भी सफाया होने वाला है,
               ये अच्छे लोग रहते कहा है तब पता चला ये हम सब मे ही कोई है,शायद मै भी हो सकता हुँ,आप भी हो सकते है ये मन से उत्पन्न एक भाव है जो इंसान को अच्छे काम करने के लिये प्रेरित करता है ये मन के भाव ही होते है जो अच्छे बुरे काम करने के लिये मनुष्य को तैयार करते है ,अब बाबा योगगुरू को ही देखो भाव जगा तो ऐसा जगा कि योग को पुरे विश्व पटल पर ला खडा किया,अब ये बुरे लोग कहा रहते है तो पता चलता है ये भी अपने मे से ही बन जाते है,एक छोटी सी दुकान मे एक चपरासी के साथ काम शुरू करने वाला आम इंसान आज सहारा जैसी कम्पनी का मालिक बन गया,बहुत उदाहरण है अच्छे लोगो के भी और बुरे लोगो के भी,चाय वाला पीएम,पेट्रोल वाला रिलायंस,रिक्सा वाला आसाराम,सब अपने मे से ही है,
                हम सब जानते है कि ये सब अफसर,नेता,बाबा ,बाबु ,अपने जैसे ही है बस मन के भाव की बात है,आजकल एक बाइक का विज्ञापन आता है जिसमे तीन लडके होते है और तीनो अपनी अपनी बाइक की तारीफ करते है और अन्त मे उनका पिता आता है और कहता है "खून तो एक का ही दोडता है"
           
             
                                     

Thursday, 6 November 2014

जिये तो जिये कैसे ..... ?

                जब मै किशोर अवस्था मे था तब एक गीत बहुत सुनाई देता था "जिये तो जिये कैसे बिन आपके...
 लगता नही दिल कही बिन आपके.." ये जो "आप" है ना ये समयानुसार बदल जाता है  बचपन मे लगता है कि
मम्मी पापा ही सब कुछ है इनके बीना कैसे जियेंगे लेकिन किशोर होते होते ये भाव मन मे किसी और को बिठा लेते है और लगने लगता है कि प्रेयसी के बिना एक पल भी जिना मुस्किल है लेकिन ढीठ इतने है कि जवानी आ गई फिर भी जी ही रहे है. जवान होते ही प्रेमिका से मन ऊब जाता है या उसे बदलने का मन होने लगता है अब इस समय ऐसा लगता है कि " अब तेरे बिन जी लेंगे हम ....जहर जींदगी का पी लेंगे हम.." पर कैसे जिया जाये ये बात अब भी समझ मे नही आती,दोस्तो को मै और दोस्त मुझे समझाते है "तु ना सही तो कोई और सही" ये सब अपने आप से छलावा है मन हार जाता है फिर इसी ऊहापोह मे घर वाले एक सुंदर सुशील कन्या से विवाह कर देते है तो कुछ दिन ऐसा लगता कि "तुम ही हो जिंदगी मेरी ....." लेकिन कुछ दिन बाद ये भ्रम भी टूट जाता है अब बच्चे हो जाते है तो लगता है बस ये ही मेरे जीने का सहारा है लेकिन यह सच नही है  फिर शुरू होती है एक हकीकत तब धन कमाई ही जीने का सहारा लगने लगता है फिर दौड शुरू होती है दुनियादारी समझ मे आती है भागम भाग भरी जिंदगी,लगता है अब जीवनभर बस एक ही काम है कमाई सिर्फ कमाई , लेकिन ये सहारा भी ज्यादा दिन नही चलता ,मन भटक जाता है .
                  यह भटकाव तो बचपन से ही चला आ रहा है,इस भटकाव मे कई लोग गलत राह पकड लेते है कोई सच्ची राह पर चल पडता है और कोई मेरे जैसा राह ढूंढता रह जाता है और पुछता फिरता है जिये तो जिये कैसे?
                   मैंने मेरे एक दोस्त से पुछ लिया " यार जीना नही आ रहा कैसे जीये ?उसने तपाक से जबाव दिया -"यार दारू पी और मजे कर जिंदगी का सबसे बडा आनन्द पीने मे है बस यही जिंदगी है," मैंने कहा ये तो "दानवो का काम है मानवो का नही"अरे यार! तु भी कहा दानव मानव के चक्कर मे पड गया सब पीते है दानव इसे सुरा कहते है देवता इसे सोमरस कहते है और मेरे जैसे ज्ञानी इसे डाइरेक्ट दारू कह देते है , बाकी है सब एक ही ,तु इसे दवा समझ कर पी लिया कर जिंदगी जीने का यह ही एक उत्तम रास्ता है.इससे लाइफ कलरफुल हो जाती है. वैसे भी आजकल फेसबुक वाट्सअप आदि पर हजारो उपदेश मिल ही जाते है चार दिन की जिंदगी है , आपने दुख देखे है तो एक इस विडिओ को देखो पता चल जायेगा असली दुख क्या होते है,आदि आदि
                    योग, आसन ,प्राणायाम,प्रात:काल भ्रमण ,मंदिर जाना,जप ,तप,यज्ञ,उपवास आदि कई उपाय ज्ञानी लोगो ने बताये तब जाकर कुछ कुछ समझ मे आने लगा कि परमात्मा से मिलन ही सच्चा सोदा है बाकी  जीवन गलत सोदा है, जीने की सही राह मिलती नजर आ रही थी बस अब जीना आने लगा था कि रोज जल्दी उठना और मंदिर जाना भगवान के दर्शन करना तब मिल ही जायेंगे भगवान ,जीना इतना सरल था और मुझे नही आ रहा था बडा अफसोस हुआ लेकिन सच्चाई एक दिन सामने आई जब  एक संत का उपदेस सुनने को मिल गया , संत महात्मा कह रहे थे " ये जीवन नाशवान है यह शरीर भी नश्वर है इसका मोह त्याग प्राणी यह सब भ्रम है,तुलसीदास जी सुंदर कांड मे लिखते है ,'जननी जनक बंधु सुत दारा,तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा. सब के ममता ताग बटोरी ,मम पद मनहि बांध बरि डोरी. हे भक्तजनो! जो प्राणी माता, पिता, भाई, पुत्र, पत्नी, शरीर,धन,घर,मित्र,और परिवार इन सबको त्याग कर सिर्फ मेरे चरणो से अपने मन की डोर बांध लेता और अपनी कोई इच्छा नही रखता, वह हमेशा सुख दुख से दूर रह्ता है," मेरा मन फिर भटकने को होने लगा कि जब सब कुछ त्यागने के लिये ही बनाया था तो फिर इतना तामझाम दिया ही क्यो था ?
                      जिये तो जिये  कैसे ? यह यक्ष प्रश्न अब भी सामने खडा था फिर एक दिन शांतिकुंज हरिद्वार जाना हो गया वहा माँ गायत्री का मंदिर है और उसी मंदिर मे एक अजीब सा मंदिर है, जिसमे तीन शीशे लगे हुये है और मंदिर पर लिखा है " भटका हुआ देवता" मन प्रफुल्लित हो गया कुछ भटकाव कम होने की आशा जगी, अंदर गया तो कोई मूर्ति नही थी तीन शीशे थे जिन पर क्रमश " सो अहम, ततवमअसि, अहम ब्रहमोस्मि"  मै वही हुँ , उसका अंश हुँ, मै ब्रह्म हुँ, मै ही ब्रह्म हुँ तो फिर किससे मिलने के लिये भटक रहा हुँ किसके लिये शरीर  त्यागना है फिर कौन माता कौन पिता सब कुछ ब्रह्म ही है फिर तुलसीदास जी ऐसा क्यो लिखते कि इन सबको छोड कर भगवान की शरन मे जाये ,मतलब साफ साफ समझ मे आने लगा था कि सब मे मै ही हुँ,सब मे मै ही तो फिर मोह किस बात का जैसा मै वैसे ही वे सब, शायद जीना आने लगा था, फिर मेरे गुरूदेव परमपूज्य वैध जी बाबा जी भालचंद्र जी ने बहुत ही सरल भासा मे बताया कि " ये दुराशा है कि कोई साथ देगा ,गिरते हुये को कोई हाथ देगा,"अर्थात जो कोई मनुस्य यह आशा करता है कि मेरे कर्मो के फल मे मेरा कोई साथ देगा तो यह दुराशा है",बस यह भाव मन मे रख कि मेरे ब्रह्म मेरे ही नही सब के दिल मे है और जीये जा जिंदगी......"
                  
                       
                      

Sunday, 27 July 2014

"मन बैरी माने ना … ………। "

                    मेरा मन कभी भी एक स्थान पर नहीं रह पाता मैं बार बार इसको पकड़ कर लाता हुँ लेकिन ये हर बार मुझे धोका दे देता है। मैं इसे बहुत समझाता हुँ लेकिन नहीं मानता। मुझे लगता है इसका एक ही उपाय है वो है ध्यान। निरंतर ध्यान लगाने से मन एकाग्र हो जाता है। ध्यान लगाना मैंने भी शुरू कर दिया मगर ये क्या मेरा मन तो इधर उधर दौड़ लगा रहा है। मै परेशान हो गया ये मेरे साथ क्या हो रहा है कुछ भी समझ में नहीं आ रहा। किसी ने बताया रोजाना करते रहो करते करते हो जायेगा। बाबा रामदेव जी भी कहते है "करने से होता है भैया " हम करने लगे करते करते एक महीना हो गया।
                      एक महीना हो जाने के बाद भी जब मन एक स्थान पर नहीं आया तो दादीमाँ याद आने लगी। दादी माँ याद आने का कारण कोई परेशानी वाली बात नहीं थी बल्कि उनकी कही हुई पुरानी बात याद आ गई दादी माँ कहती थी "मन बैरी माने ना मना तन्न कैया समझाऊ ,मन कपटी माने ना मना तन्न कैया समझाऊ "और कई प्रकार के  उद्धारण भी देती थी जैसे घोड़ा हाथी आदि। वो इसे एक भजन के रूप में गाती थी। उस वक्त मैं बच्चा था और बस  इतना ही समझता था कि दादीमाँ को कुछ चटपटा खाने का मन कर रहा होगा और डॉक्टर ने एैसा खाने को मना किया हुआ था इसलिए मन को समझा रही होंगी लेकिन आज समझ में आ रहा था कि ये सब माजरा मन को एक स्थान पर लाने का था। 
                       जैसे तैसे करके एक महीना और बीत गया लेकिन मन ध्यान में नहीं लगा। मैंने अभ्यास जारी रखा अब धीरे धीरे कुछ असर पैरों से शुरू हुआ पैर स्थिर होने लगे, बैठे बैठे सुन्न पड़ने लगे मुझे लगा असर हो रहा है। 
                       यह सब चलता रहा फिर एक दिन एक महात्मा जी का लेख पढ़ा जिसमे लिखा था नाभि पर ध्यान केंद्रित करो मैंने ऐसा करना शुरू किया इतने में ही मेरा एक मित्र जो कि आजकल योग की शिक्षा देता है। उसने मुझे बताया नाभि पर नहीं नाक पर ध्यान केंद्रित कर नजरे नाक पर जमा। मैंने ऐसा करना शुरू किया ये क्या अब मेरा मन कभी नाभि पर कभी नाक पर और कभी बाहर पूरी दुनिया में विचरण करने लगा। कभी बचपन की बाते याद आती मस्ती से खेलना ना कोई फिक्र ना कोई टेंसन खाना पीना सोना खेलना और फिर अचानक याद आ जाता बच्चों की फीस भरनी है बनिए का हिसाब करना है मकान का किराया देना है और ध्यान एकदम भग्न हो जाता।
                        मन बड़ा चंचल है बस थोड़ा सा ढीला छोड़ो तो बस उड़ने लगता है। लेकिन मैंने तो ठान लिया था कि मन को एकाग्र जरूर करूंगा। अब मैंने फिर से अभ्यास करना आरंभ किया मन को एकदम बांध लिया परन्तु ये क्या जवानी की कहानियाँ याद आने लगी कॉलेज का कम्पाउंड गार्डन केन्टीन सब ध्यान में आ रहा है मेरी क्लास के साथी सुरीली आवाज वाला मदुर संगीत फिर अचानक ध्यान डाँवाडोल हो जाता है घर वाली की डिमांड की लम्बी सी लिस्ट जिसमे सब्जी से लेकर सोने के जेवर तक की सभी डिमांड लिखी थी ध्यान फिर नाभि से नाक होता हुआ सीधा बाहर आ धमका।  
                        अब मेरे सब्र का बांध टूट रहा था कि मुझे हमारे कुलगुरु ने बताया कि हनुमान जी मन को जीत चुके है उनकी उपासना करो इससे मन स्थिर हो जाता है मन को बस में करने के लिए हनुमान जी को मनाने के लिए मंगलवार का व्रत करना शुरू किया।एक टाइम भोजन करना, सुन्दर कांड पढ़ना, फिर ध्यान में मन लगाना मेरी यही दिनचर्या होगई , काम धंधा सब छूट गया। घरवाले सब चिंतित हो गए। पत्नी ने सारा वृतांत पिताजी को बताया पिताजी आग बबूला हो गए और फिर वो फटकार पड़ी कि सारा ध्यान सीधा काम घंधे में आ गया। 
                         फिर एकदिन पिताजी ने शांति से समझाया कि "बेटा यह मन बड़ा ही चंचल होता है यह किसी किसी के ही बस में आता है तुम्हे इस चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। यह मन संत महात्माओं का भी फिसल जाता है बेटा अपनी तो ओकात ही क्या  है। इस चंचल मन को पूरी तरह से काम धंधे में लगा। यह ध्यान समाधी सब खेल है।  यह  किसी को समझ में आ जाता है और कोई इस खेल में उलझ जाता है। महात्मा बुद्ध कहते है सबसे पहले शीला चार का अभ्यास करो फिर ध्यान का ,शीलाचार -- काम ,क्रोध ,लोभ ,मोह के त्याग को कहते है इसका अभ्यास करो समझे  " यह सब बाते सुनने के बाद मेरी  समझ में यह आया कि दादीमाँ ठीक ही गाती थी। "मन बैरी माने ना … ………। "