Friday, 3 April 2015

लोहा तरै काठ के पाण .......

 लोहा तरै काठ के पाण .......


       पिता जी के जाने के बाद मै माँ को मेरे पास लाने की जिद्द करने लगा था माँ का बिल्कुल भी मन नही था गांव छोडने का, लेकिन माँ तो माँ ही होती है बेटा चाये कैसा भी हो माँ कहना मान ही लेती है अपनी इच्छाओ को बली चढाना कोई सीखे तो माँ से सीखे, अब माँ मेरे पास आ गई थी अब मुझे पता चला कि बडे बुढो की सेवा करना कितना कठिन है और कितना आनंद दायक भी, मै ने पहली बार ही यह सोभाग्य प्राप्त किया था, मै सारे दिन माँ की सेवा मे लगा रहता था, माँ मुझे अपनी तीर्थ यात्रा के वृतांत सुनाती रहती थी जो यात्राये माँ पिताजी के साथ कर चुकी थी, हरिद्वार,केदारनाथ,वृंदावन,मथुरा आदि सभी जगह के अपने अनुभव मुझे खाली समय मे बताती रहती लेकिन जब द्वारिका का जिक्र आता तो माँ उदास हो जाती और कहती – तेरे पिताजी की बडी इच्छा थी द्वारिका के दर्शन करने की लेकिन नही कर पाये, इतना कहकर किसी गहरे विचारो मे खो जाती थी,माँ ही जगत मे एक ऐसा जीव है जो अपनी भावनाये दबा कर मुस्कुरा देती है  
       मै ने कभी भी नही सोचा था कि मै किसी तीर्थ की यात्रा इस समय कर पाऊंगा लेकिन मन मे विचार था कि माँ की इच्छा की पुर्ति तो करूंगा जरूर, लेकिन कब यह पता नही था, मुझे तीर्थ पर जाना तथा वहा का भीड भाड मे भटकना कतई पसन्द नही था, बच्चे भी छोटे थे और द्वारिका की दुरी करीब नौ सौ किलोमीटर थी सम्भव नही था, वैसे तो इस इलाके मे बहुत लोग इस प्रकार की यात्राये करवाते है उन्होने मुझे कई बार कहा भी था कि-“ डाक्टर साब आप लोग भी कभी हमारे साथ चलो”, लेकिन कभी भी प्रोग्राम नही बन पाया, इस बार भी उन लोगो ने यात्रा का प्रोग्राम बना रखा था और सीट भरने के लिये लोगो से सम्पर्क कर रहे थे,  लेकिन इस बार मुझसे नही मिले क्योकि मै कभी जाता तो था नही इसलिये वे लोग घर पर नही आये, उनका प्रोग्राम फिक्स हो गया, लगभग सभी सीटे भर गई थी और सभी का जाना तय हो गया था सिर्फ चार सीट खाली रह गई और अचानक वे लोग मुझसे टकरा गये कहने लगे – इस बार तो माँ जी भी आये हुये है उन्हे तीर्थ करवा दो, मै मना नही कर सका क्योकि कुछ तो माँ को तीर्थ करवाने का एक भावनात्मक भाव था दुसरा मेरा मन भी था लेकिन छुट्टी मिलने की समस्या और कुछ आर्थिक समस्या भी थी तो मै ने टालने के विचार से कह दिया कि “ यदि माँ तैयार हुई तो चल चलेंगे” और इतना कह कर मै उनसे पिछा छुडा कर वहा से चला गया,
        माँ ने साफ मना कर दिया माँ जानती थी कि मेरी आर्थिक स्थिती बहुत ठीक नही थी, माँ पिताजी खुद अपने बच्चो पर लाखो खर्च कर देंगे लेकिन बेटा बेटी का खर्चा कम से कम करवाने की कोशीश मे रहते है माता–पिता धरतीपर परमात्मा का रूप है जिस तरह परमात्मा अपने बच्चो को सिर्फ देता ही रहता है उसी तरह माता-पिता भी बच्चो को सिर्फ देना ही जानते है वापिस लेना उन्हे शायद भगवान  ने नही सिखाया,माँ के साफ मना करने के बाद भी वे लोग कहते रहे तो माँ ने   अपनी सेहत का बहाना बनाया कि मुझसे चला नही जायेगा मेरी इतनी हिम्मत नही है, उन लोगो ने एक ओफर रख दिया कि हम आपको आगे की सीट दे देंगे, तथा चलने की ज्यादा जरूरत ना पडे इस लिये गाडी को सीधे मंदिर तक ले जाने की व्यवस्था करा देंगे और तो और आप से बच्चो का आधा किराया लेंगे, अब बच्चो का भी मन हो गया और वे दोनो दादीमाँ को मनाने मे लग गये और कहते है ना कि मूल से ज्यादा सूद प्यारा होता है माँ का मन भी पसीज गया और माँ ने बच्चो का मन देख कर हामी भर दी और सीट बुक कर दी गई,

            अब देखो आशिर्वाद का प्रभाव मुझे छुट्टी भी आसानी से मिल गई और नौ दिन की यात्रा के लिये हम तैयार हो गये,कहते है लोहा अकेला कभी भी पानी मे तैर नही सकता लेकिन जब हल्की फुल्की काठ की लकडी का सहारा लेता है करोडो टन लोहा समुंद्र को पार कर देता है ऐसा ही कुछ इस आशिर्वाद मे होता है और यह आशिर्वाद यदि माता-पिता का हो तो फिर कहने ही क्या ?   सौराष्ट्र की यात्रा प्रारंभ हुई फिर बडे आनंद से यात्रा पुरी करके हम घर वापिस आये,यात्रा के दौरान सभी ने एक ही बात कही कि “लोहा तरै काठ के पाण..” हमारी यात्रा शायद कभी नही हो पाती माँ की वजह से हमे द्वारिकाधाम, सोमनाथ,नागेश्वर ज्योतिर्लिंग  की यात्रा का सौभाग्य मिला, माता-पिता को यात्रा करवाने का फल चाहे जो भी मिले लेकिन जो आत्मिक सुख तत्काल प्राप्त हुआ उसका वर्णन करना मुश्किल है , यात्रा मे खूब मजे किये उनका जिक्र अगली पोस्ट मे करूंगा,  

Thursday, 5 March 2015

मेरा "अच्छा" नीला कोट.....

              मेरे पास एक नीला कोट है जिसे मै ब्लुजर कहता हुँ कोलेज के समय वह एक फैशन हुआ करता था बहुत ही कम लोगो के पास हुआ करता था मेरे पास था,मेरे कई दोस्त शादी विवाह के लिये या किसी समारोह मे भाग लेने के लिये उसे मांग का के ले जाते थे मै भी उसे शान से दे देता था लेकिन आजकल वह कोट मेरे किसी काम का नही है क्योकि तौंद ने बेडा गर्क कर दिया है, जब से तौंद आई है तब से वह आउट आफ डेट हो गया है मैने उसे फिट करने के लिये मेहनत भी खूब की लेकिन सफलता हाथ नही लगी,अब उसे रख दिया है
              लेकिन जब से मोदी जी का कोट करोडो मे बिका है तब से श्रीमती जी को पता नही क्या सुझा है कहती फिरती है कोट की निलामी करनी है मैने उसे खूब समझाया कि ये कोई सोने के तारो का कोट नही है ये सामान्य सा धागो का बना हुआ मामुली सा कोट है इसे बैच भी नही सकते इसे तो सिर्फ हम किसी गरीब भिखारी को सप्रेम भेंट दे सकते है वो भी यदि सप्रेम लेले तो,वरना ये तो फैंकने लायक हो गया है लेकिन वह तो मानती ही नही है कहती है आप इसे थोडा अच्छा अच्छा कहा करे फिर देखो इसके दाम लग जायेंगे, मैं ने पुछा ये अच्छा कहने से क्या होगा ? वह बोली- आप को इतना भी नही मालुम ये अच्छा शब्द तो बडा जादुई है , मैने पुछा-वो कैसे ? वह झल्ला उठी-बस आप तो रोजाना युँ ही अखबार चांटते रहते है कुछ भी सीखते नही हो, मै ने भी कुछ झल्ला के ही पुछा- अखबार मे ऐसा क्या आता है जो मेरे चांटने मे नही आता, वह कुछ समझाने वाली स्टाईल से बोली देखो - ये अच्छा शब्द है ना, ये बडे बडे जादू कर रहा है ये बात मैने अखबार मे ही पढी है, मैने कहा - मेरी तो कुछ समझ मे नही आ रहा, वह फिर बोली- देखो पहले तो मोदी जी ने "अच्छे दिन आने वाले है ..अच्छेदिन आने वाले है" कह कर जीत हाशिल करली और वो जीते तब तो उन्हे इतना महंगा कोट मिला और फिर करोडो रुपये मे निलाम हुआ है ये सब अच्छे शब्द का ही तो  कमाल है, मै उसे देख रहा था और वह देखो-देखो बोलती हुई कहती जा रही थी-" और देखो पीके फिल्म मे आमिर खान ने चार बार अच्छा अच्छा बोला और फिल्म ने चार सौ करोड का बिजनेस कर लिया, और देखो अरविंद केजरीवाल ने बार बार अपने आप को अच्छा कहा कि " मै अच्छा आदमी हुँ और सीएम बन गया, आप तो बस रोजाना कोई भी मिले उसे एक ही बात कहा करो कि मेरे पास  एक बहुत अच्छा कोट है मेरे लिये तो वह भाग्यशाली है मेरे पास जो भी कुछ है सब इस कोट की वजह से ही है
                 मैने उसे पुछा- भाग्यवान तु इस कोट के पिछे क्यो पडी हो कुछ समझाओगी , वह बोली - इस कोट को बेच कर कुछ तो हासिल होगा,जोभी हाशिल होगा उससे हम गंगा की सफाई तो नही करवा सकते लेकिन हमारी इस नाली की सफाई तो करवा ही सकते है आप तो इसे अच्छा अच्छा कहना शुरू करे,मैं ने कोट को अच्छा अच्छा कहना शुरू कर दिया लोग तो बडे अंध विश्वासी है बस पुछने लगे कहा से लाया है हमे भी चाहिये फिर क्या था हमने भी बोली का प्रोग्राम रख दिया और उस कोट की निलामी शुरू हुई क्या बात करते हो दुनिया इतनी बावली(पागल) है मुझे तब पता चला जब कोट की बोली लगने लगी और कोट की कीमत बढती ही गई ,कुछ लोगो की आपस मे होड लग गई कि कोट तो मुझे ही लेना है उनकी आपस की होड ने कोट को तो ऐसे बिका  दिया जैसा मैने तो सोचा भी नही था अब मुझे लगा शायद मोदी जी ने भी नही सोचा होगा कि द्स लाख का कोट इतने करोड दे जायेगा उसी तरह मुझे नही मालूम था कि ये मामुली सा नीला कोट बोली लगाने पर हजारो दे जायेगा लेकिन जनाब वह कोट आखिर बिक गया ,
                 घर मे अब शांति थी क्योकि अब धर्मपत्नी खुश थी मैने उससे कहा कि - नाली की सफाई कब शुरू करवानी है, धर्मपत्नी बोली - काहे की सफाई , आप तो इतना भी नही समझते कि मैने कोट बैच कर घर की सफाई करदी , मैने पुछा -फिर मोदी जी के कोट से गंगा जी की सफाई का उदाहरण क्यो दे रही थी,वह बडे ही शांति से बोली - मोदी जी ने कोई गंगा की सफाई के लिये कोट नही बैचा है ,मैने पुछा - फिर क्यो बैचा है , वह बोली- मोदीजी ने अपनी बदनामी करने वालो का मुँह बंद करने के लिये ये ड्रामा रचा था आप भी......इतना भी नही समझते.... इतना कहकर वह पल्लु फटकारते हुये किचन मे चली गई. मेरे मुँह से तो बस इतना ही निकला - अच्छा !!!!!!
               

Wednesday, 25 February 2015

मस्त फागुन की भयानकता.......

               आज उस बात को लगभग बीस साल हो गये है लेकिन मुझे तो कल की सी बात लगती है जब भी चेहरा देखता हुँ आंख के नीचे का दाग दिखाई देता है और मुझे उस भयानक रात की याद दिला जाता है
               उस वक्त मै दसवी कक्षा मे पढता था बोर्ड की परीक्षा होने वाली थी होली का दिन था होली को मंगल कर दिया गया था और सभी लोग सोने की तैयारी मे थे लेकिन शराबी और झगडालू प्रवृति के लोगो को नींद नही आती और ये लोग  तो ऐसे मोको की तलास मे ही रहते है कि कब  कोई त्योहार आये और हम झगडा करके माहोल खराब करे ऐसे लोगो की वजह से ही त्योहारो का जश्न फिका पडता जा रहा है लोग डरने लगे है कि कोई बवंडर ना होजाये,इसी डर की वजह से समझदार लोग जल्दी ही काम निपटाकर घर बंद करने की कोशीश मेरहते है
               गांवो मे होली का त्योहार बहुत ही धुमधाम से मनाया जाता था फाल्गुन का महीना एक अजब सी कशिश लेकर आता था इस महिने मे तरह - तरह के सांग निकालना, लोगो के साथ हंसी ठिठोली करना राजस्थान मे एक बहुत ही शानदार परंपरा थी पुरा फागुन का महिना रंगो से भरा हुआ होता था, रात भर बहिन बेटिया होली माता के गीत गाती थी .. होली ये तेरो ब्याह रचावा.... होली ये  तेरो लाम्बो टीको ..... चांद चढ्यो गिगनार हिरनी आथुणी जी आथुणी ...... आदि सुरिले गीतो से पुरा मोहल्ला गुंजता था ऐसे गीत हर मोहल्ले मे, हर गांव मे , हर ढाणी मे गुंजते थे, बच्चे भी कई प्रकार के खेल खेलते थे .. चोर सिपाही ... आईस पाईस ... ढाईकिलो... पिठु...लुख-मीचण्या.. आदि खेलो का लुफ्त उठाते थे , बडे-बुजुर्ग चंग और धमाल से फागुन का मजा लेते थे ,युवा लोग कई प्रकार के रूप बना कर लोगो के घर मे जाते और उनका मनोरंजन करते थे , झुठ-मुठ का बच्चा बनाकर वैध जी के घर चले जाते,एक दो जने साथ होजाते और बोलते कि- बच्चा बिमार हो रहा है जल्दी से देखो ,और जब वैधजी देखने को तैयार होते तो... सभी जोरसे हो हल्ला करके भाग जाते,बडा मजेदार होता था ये त्योहार, लेकिन अब तो एक दुसरे पर रंग डालना भी डरावना सा लगता है,मजाक तो करने का सवाल ही नही उठता,
                उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ था किसी लडके ने मजाक मे किसी से कुछ ठिठोली करली और उसमे कुछ लडकियाँ भी थी उन्हे ये हंसी मजाक पसंद नही आया और फिर क्या था बात का बतंगड हो गया और कुछ शरारती तत्वो और शराबियो ने माहोल को जाति बिरादरी का रंग दे दिया और भयानक झगडा हो गया ,मै घर पर पढाई कर रहा था बाहर झगडे की आवाज सुनकर देखने के लिये जाने लगा तो माँ ने मना भी किया लेकिन जो लोग माता -पिता का कहना नही मानते उन्हे कष्ट तो उठाना ही पडता है मुझे  भी कष्ट झेलना पडा, बाहर झगडा देखने गया और एक पत्थर मेरी आंख पर आकर लगा और एक भयानक दाग दे गया जिसे मै अब भी रोजाना देखता हुँ.. जो मुझे इस मस्त फागुन की भयानकता को दिखता है..
               लेकिन मै अब कैसे समझाऊ कि हम वे गीत, वे खेल,वे सांग, वे चंग और धमाल आज के बच्चो को बताना चाहता  हुँ आज के बच्चे कैसे जानेंगे ये सब रंगीले राजस्थान की रंगीली परम्पराये... कब शुरू होंगी फिरसे.....

Saturday, 21 February 2015

मै प्रगति पथ का पथिक हुँ.....

             
             इस कविता को मेरे परमपुज्य पिताजी वैद्य श्री माल चंद जी कौशिक ने लिखा है मेरे पिता जी ने जीवन मे बहुत ही तप किया था उसी का भाव यहा प्रगट किया गया है पुज्य पिताजी को मैने मेरा आदर्श माना है मुझे उनकी प्रत्येक कविता से मार्ग दर्शन मिलता है उनके गुरु जी आचार्य श्री राम शर्मा (गायत्री परिवार) पिताजी को अक्सर भालचंद्र कहते थे इस लिये उन्होने अपनी कविताये ज्यादातर वैद्य भालचंद्र के नाम से ही लिखी है भालचंद्र सच मे महादेव शंकर जी के पुत्र श्री गणेश जी का नाम है जो कि बहुत ही सरल और सादगी प्रिय देवता है उसी तरह पिताजी का स्वभाव भी बडा ही सरल और सादगी पुर्ण था पिताजी को हम सभी परिवार वाले बापुजी कहते है,  बापुजी हमेशा कहते थे कि "पिता कभी मरते नही है पिता हमेशा जिंदा रहते है अपने बच्चो के व्यवहार मे,विचार मे" अब बापुजी  इस दुनिया मे नही है लेकिन मेरे मन मे उनके विचार अभी भी है और मेरे पास उनकी लिखी कविताये है जिन्हे मै मेरे जीवन मे उतारने की कोशीश करता हू ,इन कविताओ मे जीवन का रहस्य छुपा हुआ है-
              मै प्रगति पथ का पथिक हुँ विपद नद से क्यो डरुंगा
               सूख कर रह जायेगा यह,आचमन जब एक लुंगा

         राह मेरी रोक ले तुफान ऐसा कौनसा है
          गा ना पाऊँ मै प्रगति का गान ऐसा कौनसा है

         दुष्टता का दमन प्रतिदिन शिष्टता से मै करूंगा
         मै प्रगति पथ का पथिक हूँ विपद नद से क्यो डरूंगा

               आ मिली है प्राण सरिता मे प्रबलतम धार कोई
                कर रहा है मर्म स्थल पर,आज तीव्र प्रहार कोई

                कह रहा है यह अंधेरा, क्यो बता छाया यहाँ
                तु ठगा सा देखता है, लुट गया पौरूष कहाँ

    आग धधकी है ह्र्दय मे, ज्योति बनकर मै जलूंगा
   मै प्रगति पथ का पथिक हुँ विपद नद से क्यो डरुंगा

                  वैद्य भालचंद्र जी कौशिक "वैद्य जी बाबा जी"

              और भी बहुत कविताये है जिन्हे मै जब समय मिलेगा तब शेयर करता रहुंगा ..

Wednesday, 14 January 2015

बल्ढु बना सरपंच

एक बार बल्ढुराम ने सरपंच बणबा की ली ठान,एक महिना पहल्या ही गुड बांट कर सरपंच लियो मान
दारू प्याणु शुरू करयो आठ दस की एक मंडली बनाई,कयाँसी आपाँ सरपंच बणा मन ही मन कई जुगत लगाई
बल्ढु सोच्यो प्रचार करुंगो और माहोल जोरको बनाउंगो,औरकोई खड्या होसी जिका न डरा के पाछो बिठाउंगो
कोई न धमकाउंगो,कोई न समझाउंगो,कोई न दारू पिलाउंगो, जो कतई ना मानेगो बीका पगा म पड जाउंगो
(2)बल्ढु के साथ वाला बल्ढु को प्रचार युँ करबा लाग्या,सरपंच तो बणसी या ना बणसी पण म्हारा भाग जाग्या
दारू म्हान रोज पिलाव गाडीयाँ मे घुमाव है,सरपंच चाहे ना बणेलो पण म्हान खुब खिलाव है
गुंडो है लफंगो है गयोबित्यो बेकार है, थप्पड देकर काम कराँ सकाँ हा यो आपणो अधिकार है
अ र गांव को टाबर है, गांव मे रहबालो छोरो है,अ ब क जिताज्यो बेचारो पंद्रह साल सूँ खड्यो होरयो है
कर्जा म डूब रियो है,हारया बर्बाद हो जावेलो,गांव को काम क र या ना क र ,खुद को घर तो बनावेलो
एक वोट का दान मे थारो  के बिगड जावेलो,गरीब घर को छोरो है,जिंदगी भर थारा गुण गावेलो
(3)एक ओडियो केसेट भी बल्ढु ने जैपुर सूँ भरवाई,बडो नेतो गांव मे आयो जणा बीच चोक म बजवाई
भाया न भाभी न स न ईयाँ कहणु है , वोट आपणो मिलकर बल्ढुराम  ही देणो है
(4) एक दिन बल्ढु भी भाषण की खूब झडी लगाई,ई गांव की खातिर मै अपनी जान की बाजी लगाई
कुआँ पर फर्जी बिजली लगार पानी की समस्या मिटाई,सेवा समीति बना कर बईमानी की हद पार कराई
बिजली की चोरी सिखाकर मै गांव को धन बचायो,बैंक सूँ लोन दिलार था न सरकारी पिसो खाबो सिखायो,
एक जणो बिदक र बोल्यो- अ र तेरे कन्न के सामान है , तु तो भाया लूट क खागो,तु तो जन्म जात बेईमान है
मै बेईमान था नही थे लोग ही मन्न बणा दिया,मै तो सीधा सादा हू मैने तो आप के घर का कचरा भी उठा दिया
रही बात सामान की मैने आगे-आगे दिखाया है,श्मशान घाट का हेंडपम्प मेरे घर के सामने लगवाया है
एक जणो बोल्यो-तु क्या उस हैंडपम्प से पानी पी रहा है,अरे भैया तूतो जिंदो की बस्ती मे मुर्दो की तरह जी रहा है
बल्ढु बोल्यो-छोडो ई बात नअब मै थाको हुकुम बजाउंगो,थेतो मन्न एकबार जिताद्यो,ईगांव ने आदर्शगांव बनाउंगो
(5)बल्ढु को विपक्षी नेतो भी रात्यूँ प्रचार करयो और करवायो, तीसरा नेता के खातिर ऐन टेम पर फार्म हटायो
बल्ढु को भाग खुल गो हनुमान जी कृपा भली करी,सारो गांव बल्ढु कानी होग्यो,बल्ढु की साग्योडी पार पडी,
कदे नही मंदिर मे जाबा लो चुनाव क दिन माथा मे सिंदूर म लगायो,
ढाणी सारी विपरीत थी ,पण गर्ज पर गधा न भी बाप बनायो
(6)चुनाव जीतने के बाद बल्ढु की नियत गोता खाने लगी,बल्ढु की किस्मत के साथ साथ्या की किस्मत भी जगी
बल्ढु बोल्यो-पण मन्न ज वोट ना दिया वा की अब खैर नही,एक जणो बोल्यो-भगवान के घर देर है अंधेर नही,
भाग्य सूँ जित्योडो हो ना कोई बल्ढु को उत्सव मनायो,धूमधाम सुँ दाम देकर खुद ही खुद को जुलूस निकलवायो,
पढ्या-लिख्या साथ्या सूँ,बढिया सो भाषण लिखवायो,बिना समझ्या ही बी भाषण न बल्ढु यूँ फरमायो
सुरज बदले चंदा बदले बदले चाहे जगत तमाम,यो बैईमानो को बाप ,ना बदलेगो बल्ढुराम
मेरा नाम की अब मोहर बनाओ और लगाओ,मेरा साथ्या न पावर देता हू चाहे आम चोक का भी पट्टा बनाओ,
बल्ढु की बाताँ सुनकर लोगाँ न हंसी आई भारी, मूसल के ध्वजा बांध दी,गांव की मति गई मारी,
बल्ढु का प्रचारी था ब मायँ-मायँ यू फुसफुसाया,बैरी जीतगो म्हे तो लोगाँ न बहुत भडकाया
बिल्ली का भाग को छिको टुटनो थो सो टुटगो,थे आज सुँ या समझल्यो,गांव को राम रूठगो,
(7)बल्ढु सरपंच बण्या पाछ ऊची उडान लगाई,प्रधान,विधायक और सांसद बणबा की योजना बनाई
हाथ उछाल-उछाल कर खूब भाषण देबा लाग्यो,इता मे ही बल्ढु को बापु बी का कमरा म आग्यो
बोल्यो-लाग है छोरा म ओपरी छाया आगी,छाया की बात सुनकर घरवाली आई भागी
उसने बल्ढु  को जोर से झिंझोडा और हिलाया,नींद मे सोते हुये को पानी डाल कर जगाया
बोली-अजी ये हाथ पांव नींद मे ही क्यो हिला रिया हो,ला ग है थे बारात को सपनो देखा कर नाच रिया हो
आंख्या खुली जणा मति ठिकाण आई, पल भर मे ही गुल होगी बल्ढु की सारी सरपंचाई

Sunday, 4 January 2015

पी के मतलब पाकिस....न ?


हमारे एक परम मित्र है बल्ढूराम, एक नम्बर के घोर विरोधी , किसका विरोध करना है और किसका नही करना ये उन्हे नही मालूम लेकिन विरोध करना है बस, जो भी थोडा सा चर्चा मे हो जाये बस विरोध शुरु,चाहे जोधा अकबर सिरियल हो चाहे जय बजरंग बली दोनो का उन्होने विरोध दर्ज करवाया है दोनो मे गलत कहानी दिखाई जा रही है वह महाशय घर मे अपने माता पिता का विरोध करने से भी नही चुकते,
आज कल तो बडे ही विरोधी स्वर निकल रहे है उनके, एक फिल्म आई है पी के, जब इस फिल्म का पोस्टर आया था तब भी इन्होने घोर विरोध प्रगट किया था लेकिन इनका प्रचार तो हुआ नही उल्टा फिल्म का ही प्रचार हो गया अब फिल्म आ गई है इसलिये इसका विरोध करना है
मुझे सुबह सुबह ही मिल गये निवृत होकर आये थे मैंने टोक दिया – “भाई ! ये सब क्या है ? आप बाहर शौच के लिये जाते हो मोदी जी तो “सब को शौचालय” की बात करते है और आप है कि ......” मै और कुछ कहता इससे पहले ही बल्ढू जी बोल पडे – “यार आप भी क्या पुरानी बात लेके बैठे हो कोई ताजा बात करनी चाहिये”, मैने पुछा – “ये पुरानी कहा से हो गई और ताजा क्या है” , बल्ढू बोला – “मोदी जी को ये शौचालय वाली बात कहे दो तीन महिने हो गये और ताजा ताजा बात तो ये हिंदुओ की खिल्ली उडाने वाली फिल्म पी के है” बल्ढू थोडा क्रोध मे आ गया फिर से बोला – ये जो पी के है ना, इसका मतलब जानते हो क्या है ? मैंने कहा – नही भाई , “ इसका मतलब होता है पाकिस्तान “ मैने पुछा- “वो कैसे ?” वह बोला – “जैसे आर जे का राजस्थान, जी जे का गुजरात डी एच का दिल्ली वैसे ही पी के का पाकिस्तान” मैने उसको समझाया – “पी के का मतलब पियक्कड से है, इसका गलत अर्थ मत निकालो यार ये तो दंगा फसाद करवाने वाली बात है”, वह चिल्ला पडा – “हो जाने दो दंगा इससे क्या होता है हम क्या हमारे भगवान का मजाक उडाने की इजाजत ऐसे ही दे देंगे , नही देंगे,हम इस फिल्म को बंद करवा कर ही रहेंगे”, मैने फिर से पुछा – “इस फिल्म मे ऐसा क्या दिख गया, जो तुम इसकी एक देश से तुलना करने लग गये” ,वह बिफर पडा – “क्या हमारे देश के नेता जी युँ ही किसी पे इल्जाम लगायेंगे कि इस फिल्म मे अरब देशो तथा पाकिस्तान की गुप्तचर संस्था का पैसा लगा है,और फिल्म को देखो तो पता लगे इसमे पुरा उसी देश का विवरण लिखा गया है, एक नंगा पंगा पान चबाता आदमी किसका प्रतीक है बताओ, ये पुरे उसी देश का प्रतीक है,” मुझे थोडी हंसी आ गई, बल्ढू गुस्से से बोला- “ये हंसने की बात नही है, आगे देखो वह राजस्थान से हमारे देश मे प्रवेश करता है उस देश के लोग भी इधर से ही घुसपैठ करते है , और भोजपुरी बोलता है वे लोग भी अपना अड्डा यु पी को ही बनाते है और दिल्ली मे रहता है” , बल्ढू फिर मुझसे पुछता है- “कौशिक जी ! आप बताओ लगभग फिल्मे मुम्बई की पृष्टभूमी पर ही बनती है ये दिल्ली पर क्यो ?,
 मैने उसे समझाते हुये कहा – “ये महज इत्फाक है ये कोई कारण नही है”
मैने बल्ढू को फिर से समझाने की कोशीश की – “और सुनो इस फिल्म की कहानी एक बहुत ही सुलझे हुये लेखक श्री अमिताब जोशी ने लिखी है और वो इसी देश के हिंदु है वो अंटशंट बाते क्यो लिखेंगे”, बल्ढू थोडा नरम पडा फिर बोला – “वो तो ठीक है लेकिन इसमे हिंदु धर्म की ही खिल्ली उडाई है हमारे बाबा , हमारे मंदिर, हमारे भगवान सब हमारे ही उनका कोई भी नही”, समझाते हुये मैंने कहा – “भाई ऐसा कुछ भी नही इस फिल्म मे सभी धर्मो की बात कही गई है किसी का धर्मांतरण वाला मुद्धा उठाया है , किसी का महिला शिक्षा का मुद्धा बताया है,” बल्ढू बीच मे ही बोल पडा – “लेकिन उनका मस्जिद तो सिर्फ बाहर से ही बताया है हमारा मंदिर मुर्ति सब का मजाक उडाया है हम तो इस बात का विरोध करेंगे”,अब मुझे थोडा गुस्सा आ गया थोडी ऊची आवाज मे मै बोलने लगा – “मजाक भगवान का नही सिर्फ पाखंड का उडाया है कुछ समझ मे आ रहा है तुझे”, मुझे क्रोध मे देख कर बल्ढू चुपचाप सुनता रहा मै उसे सुनाने लगा- “दयानंद सरस्वती जी ने भी पाखंडी एवम ढोंगी लोगो के लिये एक पताका फहराई थी “ पाखंड खंडन” ये समझ ये पी के भी उसी पाखंड खंडन का ही रूप है जा अपनी सोच बदल ...” मै और कुछ बोलता इतने मे ही मोहल्ले के कुछ बच्चे चिल्ला चिल्ला कर बोलने लगे ... और शौचालय बनवा .... सोच बदल .... और शौचालय बनवा…….. इति.  
       



Friday, 12 December 2014

अच्छे लोग ..!

                आज अच्छे लोगो की ही बात करते है , सबसे पहले उन लोगो की बात करते है जो हम सब को यात्रा के दौरान मिल जाते है बस मे भयंकर भीड होती है खडा होने की जगह भी नही होती इतने मे कोई उठ कर कहता है "सर ! आप यहाँ बैठ जाये"  ऐसा मेरे साथ बहुत बार हुआ है आप लोगो के साथ भी ऐसा जरूर हुआ होगा, कई ऐसे लोग भी है जो कभी किसी महिला को, कभी किसी बुढे लोगो को, कभी किसी बीमार लोगो को अपनी सीट दे देते है लेकिन हम ये बाते ज्यादा याद नही रख पाते जल्दी ही भूल जाते है,ऐसे कई उदाहरण देखने को मिल जायेंगे कभी बस स्टेंड पर पानी पीलाते लोग,कभी सर्दियो मे कम्बल बाँटते लोग, सब अच्छे लोग ही तो है,
             दुनियाँ मे अच्छे लोगो की कमी नही है,लेकिन कब कौन किसके लिये बुरा बन जाये कह नही सकते तुलसीदास जी सुंदर कांड मे लिखते है जो कार्य सीता के लिये शगुन हो रहे थे वे ही कार्य रावण के लिये अपशगुन हो रहे थे,इसलिये कई अच्छे काम किसी किसी के लिये बुरे बन जाते है,चिकित्सको का ओपरेशन करना अच्छा काम है लेकिन जहरीली दवा से मौत को प्राप्त करना बुरा काम है सरकार जब भी अच्छे काम करती है उसका उल्टा ही असर होता है सरकार मँहगाई कम करती है तो साहुकार के घर मे मातम और मँहगाई कम ना करे तो मजदूर के घर रोना धोना शुरू,अब सरकार ने एक सपना दिखा दिया "अच्छे दिन आने वाले है"
              अच्छा काम कुछ लोग तो लोगो को दिखाने के लिये करते है, कुछ लोग अहंकार पुष्ट करने के लिये करते है और कुछ लोग इंकमटेक्स बचाने के लिये भी करते है,हर अच्छे काम का अपना अपना क्षेत्र है आज कल एक अच्छा काम जोरो पर है" सफाई करो" ,पहले ये काम "आप"कर रहे थे और अब मोदी जी कर रहे है इसका बडा असर हुआ है कोंग्रेस साफ हो गई , और तो और कई पाखँडी भी साफ हो गये ,और कई सफाई की लाइन मे है,जल्दी ही उनका भी सफाया होने वाला है,
               ये अच्छे लोग रहते कहा है तब पता चला ये हम सब मे ही कोई है,शायद मै भी हो सकता हुँ,आप भी हो सकते है ये मन से उत्पन्न एक भाव है जो इंसान को अच्छे काम करने के लिये प्रेरित करता है ये मन के भाव ही होते है जो अच्छे बुरे काम करने के लिये मनुष्य को तैयार करते है ,अब बाबा योगगुरू को ही देखो भाव जगा तो ऐसा जगा कि योग को पुरे विश्व पटल पर ला खडा किया,अब ये बुरे लोग कहा रहते है तो पता चलता है ये भी अपने मे से ही बन जाते है,एक छोटी सी दुकान मे एक चपरासी के साथ काम शुरू करने वाला आम इंसान आज सहारा जैसी कम्पनी का मालिक बन गया,बहुत उदाहरण है अच्छे लोगो के भी और बुरे लोगो के भी,चाय वाला पीएम,पेट्रोल वाला रिलायंस,रिक्सा वाला आसाराम,सब अपने मे से ही है,
                हम सब जानते है कि ये सब अफसर,नेता,बाबा ,बाबु ,अपने जैसे ही है बस मन के भाव की बात है,आजकल एक बाइक का विज्ञापन आता है जिसमे तीन लडके होते है और तीनो अपनी अपनी बाइक की तारीफ करते है और अन्त मे उनका पिता आता है और कहता है "खून तो एक का ही दोडता है"