Wednesday, 18 January 2017

बसा किसी और को दिल में .....!

देखते ही उसको , दिल मेरा, ना जाने  क्यों मचलता है।
मै जब भी देखूं उसको तो ,  मुझे ऐसा क्यों लगता है ।।

कशिश सी उठती है,  उसका सामीप्य पाकर ।
क्या करू कैसे कहूं, उसको , समीप उसके जाकर।।

जब कभी वो नहीं थी, तब भी यह नादां यूँ कहता है ।
क्यों यह बार बार  , उसके लिए तड़फता रहता है ।

कभी भी उसकी बातों से, जीवन संवार न पाया  । हर बार उसको  मैने , अपने से जुदा ही  पाया   ।।

कभी वो कभी कोई और , मेरे जेहन में घूमती रही हैं।
उसके जैसी आज तक , हजारो आती जाती रही है ।।

मगर दिल तो कभी एक जगह टिकता ही नही था ।
वो समझने रूकती ,मै पलभर भी रुकता नही था ।।

आती रही जिंदगी में मेरे,एक से एक दिल के करीब।
कभी कोई अमीर,कभी कोई जवां ,कभी कोई गरीब।।

मगर आजकल "वेद" , तुझको ये क्या हो गया है ।
कोई तुझे चाहता है नही, फिर भी कही खो गया है।।

कैसे कोई आकर, अपना आसिया बना सकता है।
किसी के बिना खुद, अकेले कैसे समा सकता है ।।

शायद वो पहले से ही समाया हुआ था मेरे दिल में ।
मुझे कभी कभी ,आहट सी होती थी इस दिल में ।।

सभी में मुझे प्यार की तलाश थी , पर मिला नही ।
आज जब मिला तो , लगा किसी से कोई ग़िला नही।।

अब तो "वेदप्रकाश" , कुछ इस तरह बदल गया है ।
किसी और को बसा दिल में, खुद कही निकल गया है ।।

Saturday, 19 November 2016

मन में उमंग है

मन में उमंग है मेरे, कोई है ,जो जगत को चला रहा है।
मुझ जैसे पाखंडी को , पल पल कैसे सजा रहा है ।।
मन को छूने वाली सच्ची बाते, मुझको कह रहा है ।
अहंकार को कर परास्त , आज मुझे समझा रहा है।।

मै तो कितना बदल गया,किस तरह जीवन जी रहा हूँ ।
अपने पराये का भेद न था,सब अपना ही कह रहा हूँ।।

मैने बहुतो को दुःख दिया है , माटी पलीद करता रहा हूँ।
गुस्से का सैलाब उमड़ता था, जिंदगी घसीट ता रहा हूँ।।
आज लगता है सब गलत किया , क्यों किया पता नही।
उसकी एक नजर पड़ी तो , मै कही पर भी टीका नही।

वह बलवान, मै नादान, जीवन गवां के पूछ रहा हूँ ।
मै तो कितना बदल गया, किस तरह जीवन जी रहा हूँ।।

सुहाता था क्या ? मुझे, कोई आँख उठाके तो देखले ।
जुबान खींच लू उसकी ,गर कोई कह कर तो देखले ।।
काम, क्रोध, मद लोभ ,नरक से सब मुझमें साकार थे ।
एक पल भी सुख़ी ना था, चाहने वाले बड़े लाचार थे ।।

उसने सिखाया जीवन क्या है,अब उसकोे  पूज रहा हूँ।
मै तो कितना बदल गया, किस तरह जीवन जी रहा हूँ।।

वो कौन है कैसा है किसने उसे देखा है,कोई तो बता दे ।
उससे मिलकर जीवन,क्यों सँवरता है ,कोई तो बता दे।।
मिला नही अब तलक, पर खोजकर रहूँगा एक दिन।
मिलेगा मुझको विश्वास है, दुनिया कहा है उसके बिन।।

अब उमंग है तरंग है , मै बदला बदला सा जी रहा हूँ।
मै कितना बदल गया ,किस तरह जीवन  जी रहा हूँ।।

हिलोरे उठ रही है , प्रेम की कोई धार सी निकल रही है।
तब सिर्फ "वेद" था ,अब दुनियां "प्रकाश"  कह रही है।।
कभी ज्ञान नही था , अब ज्ञानपुंज सा चमक रहा हूँ।
मेरे प्रभु अब तेरी शरण में , मै ये जीवन जी रहा हु।।

कोई तो समझो मेरा चिंतन , क्या मैं कही बहक रहा हूँ।
मै कितना बदल गया,किस तरह जीवन जी रहा हूँ।।

डॉ वेदप्रकाश कौशिक

Tuesday, 8 November 2016

मैं अच्छा हूँ या बुरा हूँ ?

मै अच्छा हूँ या बुरा हूँ, मुझे पता नही।
कुछ लोग मुझपे मरते है,कुछ मारने को तैयार है।।

कहते है कुछ लोग , भला इंसान है "वेद" ।
कुछ लोगो की आंखो में जलन होती है मुझे देखकर ।।

लोग मिलने को तरसते है , मिलने आते है बार बार ।
किसी से जब मैं मिलता हूँ, तो मुँह फेर लेते है ।।

कहते है कुछ लोग , बहुत धार्मिक है "वेद प्रकाश"।
किसी किसी को मेरी पूजा , लगती  है बकवास ।।

किसी को लगता है , मेरा स्वभाव सहयोगी है ।
कुछ तो मुझे विखंडन का , पर्याय कहते है ।।

मेरे काम की तारीफ़ होती है, कभी कभी ।
कभी कभी मुझपे , उलाहनों की बरसात होती है ।।

मेरा चरित्र चारों तरफ मेरी चर्चा करवाता है।
कोई चरित्र "वान" कहते है, तो कभी कोई हीन कहता है।।

जिसको जैसा देखना है , देखले जी भर कर।
मैं बचपन से आज तक, जैसा था वैसा ही हूँ मगर ।।


Monday, 5 September 2016

मै बदलना चाहता हुँ ...!!!!

मै बदलना चाहता हुँ ...!!!!

आज मुझे मेरे अंदर एक बदलाव करने की तलब सी लग रही है मै चाहता हुँ कि मै बदलाव करू जो कुछ दुनियाँ मे हो रहा है उसे बदल कर एक नही दुनियाँ बना दुँ बहुत कोशीश करता फिरता हुँ मेरे अन्दर एक अपरिचित सी छाया फैल रही है मेरी काया मेरे बस मे  नही है यह सब क्या हो रहा है पुरी दुनियाँ एक दुसरे लोगो की दुश्मन होती जा रही है हर हर करके घर घर बनाने वाले अब सब कुछ जुमला बता रहे है पुरा तंत्र खराब हो रहा है चारो तरफ हा हा कार मचा है कोई आतंकवाद से पीडित है कोई भ्रष्टाचार से परेशान है कोई बेरोजगारी से त्रस्त है कोई बिमारी से ग्रस्त  है, अब तो लोग मूल भूत आवश्कताओ के लिये तरस रहे है पानी तक नही मिल रहा है लोगो को,भोजन के लिये भटक रहे है क्यो ये सब हो रहा है यह सब अपने देश की ही नही इस पुरी  दुनिया की भ्रष्ट व्यवस्था के कारण हो रहा है या यहाँ के लोग परस्पर ही भ्रष्ट हो गये है कुछ भी समझ मे नही आ रहा है मै तो चाहता हुँ सब कुछ बदल दुँ एक नई दुनिया बसा दुँ लोग उस दुनिया मे खुसी खुसी रहे और आनंद से जीवन व्यतीत करे लेकिन यह सब कैसे संभव हो सकता है अकेला चना क्या भाड फोड सकता है,

मै इस सोच मे डुबा हुआ विचार कर ही रहा था कि मेरे परम मित्र श्रीमान बल्डुजी महाराज आ गये,बोले – भक्त ! वेदप्रकाश ! किस उलझन मे पडे हो बेटा ?, मै ने अपनी सारी पीडा बता दी कहा – प्रभु ! मै इस दुनिया को बदलना चाहता हुँ इसे मेरे अनुकूल बनाना चाहता हुँ कोई उपाय हो तो बताये ? , बल्डु जी ने तो जैसे मेरे जबाव का उत्तर जेब मे ही डाल रखा हो झट से एक चस्मा जेब से निकाला और बोले – ले भक्त ये आंखो पर लगा ले, मै ने वह चस्मा आंखो पर लगाया तो सब कुछ हरा हरा ही दिखने लगा, मै ने कहा – महाराज  सब कुछ सावन के अंधे की तरह हरा ही हरा दिखाई दे रहा है इसका क्या मतलब है, मेरे मित्र बल्डु जी महाराज ने बडे ही अदब से बताया कि – डाक्टर साब कुछ भी समझ मे नही आया या जानबूझ कर अनजान बन रहे हो ? , अब अनजान बन ही रहे हो तो बता देता हुँ कि यह चस्मा ही है जो दुनियाँ को अपने अपने हिसाब से देखने के लिये लोगो ने आंखो के आगे लगा रखा है बस चस्मा हटा दो तो दुनियाँ तो बहुत ही सुंदर है सब कुछ व्यवस्थित है आपको यदि बदलना ही है तो दृष्टि को बदलो स्रष्टि को बदलने की कोशीश मत करो,

मै ने पुछा – यार बल्डु यह सब तेरे जैसे झाहिल गंवार आदमी के दिमाग मे कहाँ से आ जाती है ये बाते, तुझे ये सब कौन बताता है? बल्डु ने फिर अपनी जेब मे हाथ डाला मै ने बीच मे ही टोक दिया – ये सारी समस्याओ का हल तु जेब मे ही लिये फिरता है क्या?  वह  थोडा मुस्कराया और बहुत ही आदर और गम्भीर शब्दो मे बोला – मेरी जेब मे  तेरी समस्याओ का हल ही नही पुरी दुनिया की समस्याओ का समाधान भरा पडा है, और देख यह है श्री श्री 1008 श्री बाबा ऐंड्रायड मोबाईल मुनि जी, ये महाराज जी बोलते नही है इसमे ऐसे ऐसे सेवक काम करते है जो सभी समस्याओ का हल लिये आपकी सेवा मे आपको मिल जाते है जैसे वाट्सअप फेसबुक हाईक... पता नही क्या क्या है एक तो गुगल मुनि है उनसे तो आप कुछ भी पुछो बाबा एक के बदले दस बताते है, बस इस झाहिल और गंवार की विद्ध्वता का राज यही है ये ही सुबह से लेकर शाम तक हजारो प्रकार के देशी दवा के नुस्खे से लेकर महाव्याधि तक के उपचार बताते है ये ही तरह तरह के ज्ञान की बाते  बताते है बिना बोले आपको सब दिखा देंगे मंगला आरती से लेकर शयन आरती तक सब के दर्शन इसमे हो जाते है, 

वह बोले जा रहा था एक से बढकर एक गुणो का बखान कर रहा था, मै चुपचाप सुन रहा था उसकी कथा चल रही थी वह फिर से बोला – देख कौशिक ! इसमे तु भगवान के भजन,रामचरित मानस की चौपाई,गीता के श्लोक कुछ भी सुन सकता है लोगोको सुना सकताहै, और तो और तु फेसबुक पर किसी भी प्रकार की भडास निकाल सकता है और तो और वाट्सअप पर ग्रूप बना कर किसी भी प्रकार की राजनीति कर सकता है बिना गला फाडे तु चिल्ला सकता है

अब मेरे सब कुछ समझ मे आ रहा था मुझे लग रहा था कि खुद को बदलने का विचार त्याग कर मुझे अभी तो मेरा मोबाईल बदल लेना चाहिये  


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Thursday, 2 June 2016

अंधेरा घिर आने से पुर्व---

       जब भी मेरे मन मे निराशा का भाव आता है मै हमेशा इस कविता को पढता हुँ, इसके अंदर छुपे गहरे आध्यात्मिक भावो को महशूस करता हुँ ,जिससे मुझे बहुत ही शकून मिलता है और मन मे एक उत्साह का आभास होने लगता है, मेरे पिताजी की लिखी कविताओ मे से यह एक बहुत ही प्रेरणादायक कविता है, यह कविता "गायत्री उपवन" नामक मासिक पत्रिका मे छप चुकी है,

        मेरे पास संग्रह के रूप मे रखी हुई थी,इस प्रेरणादायक कविता से आप भी प्रेरणा ले और जीवन को सुखद और आनंद दायक बनाये...

 अंधेरा घिर आने से पुर्व-----

अंधेरा घिर आने से पुर्व प्रवज्वलित दीप करे तैयार
भला फिर क्योहोंगे ,भयभीत प्रकाशित होंगे जब सब द्वार

स्वप्नवत है सारा संसार, यहाँ के मिथ्या सब व्यापार
सभी को रहना दिन दो चार अंत मे जाना हो लाचार
मृत्यु के आघातो से पुर्व करेंगे प्राणो का उपचार
भला फिर क्यो होंगे संतृस्त शक्ति युक्त होंगे जब आधार
अंधेरा घिर आने से पुर्व .....

अनय का भीषण झंझावात, कर रहा जन मन पर आघात
मनुजता हो बैठी उद्द्यंड, भौतकी धारा हूई प्रचंड
भंवर मे फंस जाने से पुर्व, करेंगे बेडे का उद्धार
भला फिर क्यो होंगे क्षति ग्रस्त, नदी को कर लेंगे जब पार
अंधेरा घिर आने से पुर्व ........

देखकर हमको युँ सन्नद्ध, विघ्न भी हुये श्रंखला बद्ध
किंतु हम निर्भय होकर चले, शांति के कुंजो बीच पले
समर मे सो जाने से पुर्व करेंगे रिपुपर प्रबल प्रहार
भला क्यो होगी अपकीर्ति जब मनाये नित्य मरण त्यौहार
अंधेरा घिर आने से पुर्व ......

  लेखक-- वैद्य श्रीमालचंद्र जी कौशिक "वैद्यजी बाबाजी" 

Sunday, 22 May 2016

भाई बडा या दोस्त ???

भाई बडा या दोस्त ???

आज मेरा मन बहुत ही विचलित हो गया है कि समाज मे ये सब क्या हो रहा है एक मेसेज आजकल वायरल हो रहा है कि “सगे भाई से बोल-चाल बंद है और फेसबुक पर पांच हजार दोस्त है, भाई से बोलने मे शर्म महसुश होती है और दोस्तो के साथ रोज पार्टी हो रही है,”  समाज मे यह एक मामूली सी बात लगती है लेकिन क्या यह सब सच मे ही मामुली सी बात है,? मेरा मन आज बार बार एक ही बात पर टिक रहा है कि भाई बडा है या दोस्त ???

 मै एक बहुत ही आध्यात्मिक टाईप का विद्ध्यार्थी रहा हुँ और मेरा मानना है कि शास्त्र जितने प्रामाणिक है उतने प्रामाणिक इस संसार मे और कुछ नही है भारत के मनिषियो का लोहा तो विदेशी लोग भी मानते है हमारे देश की समाज व्यवस्था तो सभी देशो को लुभाती है लेकिन हम कहा जा रहे है कुछ समझ मे नही आ रहा है,

शास्त्रो मे मित्र की परिभाषा भी लिखी गई है तो भाई का भी गुणगान किया  गया है, हमारे देश मे सबसे बडे आदर्श भगवान श्रीराम जी और भगवान श्रीकृष्ण जी ने भी अपने भाईयो के साथ मिलकर ही दुश्मनो पर विजय प्राप्त की है भगवान श्रीराम अपने भाईयो भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न सहित समाज मे भाई चारे की एक बहुत ही बडी मिशाल थे,

शास्त्रो मे लिखा है कि सच्चा दोस्त वह होता है-

“पापानिवारयति योजते हिताय, गुय्हम निगुय्हति गुणान प्रकटि करोति,
आपदगन्तम च न जहाति ददाति काले, सन्मित्रम लक्षणमिदम प्रवदंति विज्ञा,” 

अर्थात- जो अपने मित्र को पाप के मार्गपर जाने से रोकता है,सन्मार्ग की ओर प्रेरित करता है, दोस्त की गुप्त बातो को छिपाता है और गुणो का बखान करता है,आपत्ति के समय नही छोडता है अर्थात आपत्ति मे साथ देता है अच्छे मित्र की यह पहचान विद्ध्वानो ने बताई है,”

आजकल के कथित मित्र क्या सच मे ऐसे है ? जहाँ  तक मेरा  मानना है आजकल के अधिकतम मित्र इस परिभाषा के बिल्कुल विपरीत है,पाप के मार्ग पर यदि पहली बार कोई ले गया होगा [जैसे शराब पीने के लिये,सिगरेट पिलाने के लिये, किसी अश्लील क्रियाकलापो मे] तो वह मित्र ही होगा, सन्मार्ग पर [जैसे भजन कीर्तन मे जाने से,प्रातःकाल घूमने जाने से] जाने से रोकने वाला कोई पहला व्यक्ति  होगा तो वह आजकल का कथित मित्र ही रहा होगा, अपने मन की कोई गुप्त बात यदि दोस्त को बता दी तो उसे सभी को बताने का काम किया होगा तो इस कथित दोस्त ने ही किया होगा, और गुणो का बखान तो दूर की बात है यदि किसी काम मे यदि दोस्त की बुराई करने से काम बन रहा है तो दोस्त का पुरा कच्चा चिठ्ठा खोल कर रखने वाला दोस्त ही होगा, यह कथित दोस्त तो सब जगह मिल जायेंगे लेकिन आजकल सच्चा दोस्त मिलना बहुत ही मुश्किल है

अब रही बात भाई की तो “भाई भाई लडे भले ही टुट सका क्या नाता – जय जय भारत माता” इस प्रकार की कविताये हम बचपन से पढते आये है भाई तो भाई ही होता है भाई को सहोदर भी कहा जाता है जो एक ही उदर से पैदा होते है उनमे भिन्नता होते हुये भी समानता तो जरूर होती है मन से हम भाई के दुश्मन भी बन जाये लेकिन हमारी आत्मा यह कभी भी बर्दास्त नही करेगी, भाई के लिये दिल पसीज ही जाता है इस बात के शास्त्रो मे भी उदाहरण मिलते है महाभारत और रामायन जैसे हिंदुओ के धार्मिक ग्रंथो मे कई प्रसंग आते है जिसमे यह बताने  की कोशीश की गई है कि कलयुग मे भाई का क्या महत्व है और दोस्त का क्या ?

रामचरित मानस मे गोस्वामी तुलसी दास जी लिखते है जब पता चल गया कि सीता मैया रावण के पास है और सब लोग समुद्र किनारे आ गये और समुद्र पार करने का प्रयास कर रहे थे रावण के भाई विभिषण ने अपने मित्र रामजी को एक नेक सलाह दी कि – समुद्र आपके पुर्वज है अतः आप प्रार्थना करे कि वह हमे रास्ता दे दे, लेकिन यह बात लक्ष्मण जी को पसंद नही आई,

जो अपना होता है उसे किसी दुसरे की गलत सलाह पर क्रोध आ जाता है लक्ष्मण जी तो भाई थे विभिषण की सलाह पर उन्हे भयंकर क्रोध आ गया,लक्ष्मण जी बोले- यह देव ! देव ! का आलाप करना इस समय उचित नही है आप कायरो की तरह काम ना करे और इसी समय समुंद्र को सौखने का काम करे, लेकिन राम जी ने मर्यादित मुस्कान के साथ अपने मित्र की बात को ना टालते हुये लक्ष्मणजी को समझाया, तब तुलसीदास जी लिखते है – “सुनत बिहसि बोले रघुवीरा, ऐसेहि करब  धरहु  मन धीरा”

 हे मेरे प्रिय  भाई ! तुम कह रहे हो मै वैसा ही करुंगा,बस थोडी देर मन मे धीरज को धारण करो, यह बहुत ही गहराई की बात है भगवानको मालूम था कि यह सब लक्ष्मण कह रहा है वैसे ही होने वाला है लेकिन भाई की बात पर क्रोध ना करते हुये उसे समझा दिया लेकिन आजकल यह नही होता जबकि इसके विपरीत ही होता है भाई कुछ सलाह दे दे और वह भी क्रोध मे हो तो फिर मानना तो दूर भाई से उस दिन के बाद सम्बंध विच्छेद हो जाता है

ऐसा ही एक प्रसंग  और आता है जब लक्ष्मण जी के शक्ति  बाण लग जाता है और रामजी मनुष्य की तरह  विलाप कर रहे उस समय तुलसी दास जी लिखते है –

“सुत वित्त नारि भवन परिवारा, होहि जाहि जग बारहि बारा
अस विचारि जियँ जागहु ताता,मिलई न जगत सहोदर भ्राता”

अर्थात इस संसार मे बेटा, धन, पत्नि, भवन, और परिवार यह सब बार बार मिल सकते है लेकिन जीवन मे सगा भाई बार बार नही मिलता ऐसा विचार करके मेरे भाई तुम जाग जाओ

यह सब उस भाई की बात है जो अपने भाई की सलाह को मानता है और एक दुसरे मे प्रेम होता है और इसी प्रसंग मे रावण और कुम्भकरण का भी जिक्र किया गया है लेकिन रावन अपने भाईयो की सलाह नही मानता जिसके लिये लिखा है, जब कुम्भकरण को पता चलता है कि रावण सीतामैया का हरण करके ले आया है और अब युद्ध जीतने की सोच रहा है तब सलाह दी थी,“जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान” 

जब भाई भाई से अलग हो जाता है या यह कहे जब भाई भाई को लात मार कर भगा देता है तब भाई आयु हीन हो जाते है “ अस कही चला विभीषण जबहि आयुहीन भये सब तबहि” ऐसे बहुत उदाहरण है जो यह सिखाते है कि जो अपने भाईयो की बात मानता है अपने परिवार से मेलजोल रखता है वह निश्चित ही जीवन मे सफल होता है और जो नही मानता वह बर्बाद हो जाता है,

महाभारत मे भी कई ऐसे प्रसंग मिलते है जिसमे भाई का जिक्र आते ही मित्रता फीकी पड जाती है जब कर्ण को पता चल जाता है कि पान्डव मेरे भाई है और कुंती माता है तो उसने भी अपने बहुत अच्छे दोस्त के साथ धोखा कर दिया और अपनी माता को वचन दे दिया कि तेरे बेटे पांच जीवित रहेंगे, यहाँ बात वचन की नही भाई के प्रति प्रेम की है, जब सगा भाई पीडा मे होता है दुःख जरूर होता है,

भाई और दोस्त मे एक लक्ष्मण  रेखा होनी चाहिये भाई भाई होता है और दोस्त दोस्त होता है मेरी नजर मे भाई का  स्थान सदैव दोस्त से ऊंचा ही होता है जब यह बात सभी के समझ मे आ जायेगी तो यह जीवन बहुत ही सुंदर हो जायेगा

      
    

Thursday, 14 April 2016

समझो सबमे साँई है

  आज मेरे मन मे यह भाव आया कि लोग क्यो अपने ऊंचेपन का घमंड करते है यह गर्व उन्हे पतन की ओर ले जाता है यह कविता आभाष दिलाती है कि हम चाहे कितने ही ऊंचे हो जाये लेकिन एक दिन धरातल पर जरूर आ जायेंगे, आज मेरे मन के भाव मे पढे मेरे परम पुज्य पिताजी की यह कविता ......    

ऊँचे पन का गर्व ना करना ,ऊँच नीच अस्थाई है
समता की महिमा संतो ने सबसे बडी बताई है

ऊँचे सुरज को प्रतिदिन ही , ढलता हुआ देखते है
वृक्ष बने छोटे अंकुर को, फलता हुआ देखते है
ऊँचे ऊँचे हिमखंडो को, गलता हुआ देखते है
सुक्ष्म चेतना के बल जड को, चलता हुआ देखते है
अणु मे वही विराट छुपा है , देता विश्व दिखाई है
ऊँचे पन का गर्व ना करना, ऊँच नीच अस्थाई है

बडे बडे धनवान धरा पर भिक्षुक बनते देखे है
रंक बने भुपाल भूमी पर, इतिहासो मे लेखे है
मुर्ख बने विद्ध्वान यहाँ पर, विद्ध्वानो की हंसी उडी
महानगर विद्ध्वस्त हो गये , जंगल मे है भीड जुटी
बिना आत्म चिन्तन के , शांति ना मिलने पाई है
ऊंचे पन का गर्व ना करना, ऊंच नीच अस्थाई है

भूख प्यास सबको लगती सब रोते हंसते आये
सोते जगते है सब प्राणी, जन्म लिया मरते आये
राग द्वेष की घोर घटाये, संघर्षो को बरसाती
यही प्यार की गंगा बहकर, सबको शीतल कर जाती
द्वंद मुक्त को रोक ना पाती, ऊंच नीच की खाई है
ऊंचे पन का गर्व ना करना ऊंच नीच अस्थाई है

अहम पुष्ट करने की खातिर, छल छदमो को अपनाते
बडे बडे पदवी धारी, निज कर्मजाल मे फंस जाते
स्वार्थत्याग –परमार्थ पथिक बन, जो जन आगे बढ जाते
उनकी महिमा का बखान कर, बुद्ध जन उनके गुण गाते
हो व्यवहार भेद बेशक, पर समझो  सबमे साँई है
ऊंचे पन का गर्व ना करना ऊंच नीच अस्थाई है

 परम आदरणीय श्री वैद्ध्य मालचंद्र जी कौशिक  की लिखित यह कविता एक बहुत ही बडा संदेश देती है मुझे मेरे पिताजी की कविताये बहुत ही प्रभावित करती है तथा मार्गदर्शन भी करती है मुझे इस कविता को पढने के बाद यह आभास हुआ कि सच मे ही ऊंचापन अस्थाई है,मेरे पिताजी मेरे गुरू जी भी है,  मेरे अलावा उनके बहुत शिष्य है उन सभी के लिये उनके द्वारा लिखे यह अनुभव मै शेयर करता रहुंगा, आप भी पढे और अपने इष्ट मित्रो को भी पढाये ,